नई दिल्ली। संसद में वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर चल रही बहस के बीच जमीयत उलमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी ने अपने एक सोशल मीडिया पोस्ट में विवादित टिप्पणी की है। मदनी ने लिखा कि उन्हें “मर जाना स्वीकार है, लेकिन वंदे मातरम् नहीं गा सकते।” उनके इस बयान के बाद राजनीतिक माहौल और गर्मा गया है।
मदनी ने एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि उन्हें किसी के द्वारा वंदे मातरम् गाने या पढ़ने पर आपत्ति नहीं है, लेकिन मुसलमानों के लिए अल्लाह के सिवा किसी और की इबादत करना धार्मिक रूप से स्वीकार्य नहीं। उन्होंने दावा किया कि वंदे मातरम् के चार श्लोकों में देश को देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसकी पूजा करना इस्लाम की मान्यताओं के खिलाफ है। मदनी के अनुसार, “वतन से प्रेम करना अलग बात है और उसकी पूजा करना अलग बात।” उन्होंने कहा कि भारत का संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) देता है, इसलिए किसी को उसकी आस्था के खिलाफ कोई नारा या गीत गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
इससे पहले AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने 8 दिसंबर को लोकसभा में इसी मुद्दे पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि देशभक्ति को किसी धर्म या पहचान से जोड़ना संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध है और इससे सामाजिक विभाजन बढ़ सकता है। भारत माता के नारे पर आपत्ति जताते हुए ओवैसी ने कहा कि अगर देश को देवी के रूप में संबोधित किया जाएगा तो उसमें धर्म का तत्व स्वतः शामिल हो जाता है।
ओवैसी ने कहा, “हमारे संविधान की शुरुआत We The People से होती है, न कि किसी देवी-देवता के नाम से। विचार, अभिव्यक्ति और इबादत की स्वतंत्रता लोकतंत्र का मूल है। किसी नागरिक को किसी देवी-देवता या खुदा की इबादत करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।”
AIMIM प्रमुख ने यह भी कहा कि मुसलमानों से बार-बार वफादारी का प्रमाण-पत्र मांगना बंद होना चाहिए, क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम में उनकी कुर्बानियां इतिहास में दर्ज हैं। उन्होंने संसद में कहा कि वंदे मातरम् कहना अनिवार्य करने की मांग संविधान के खिलाफ है।




