सुप्रीम कोर्ट ने अरावली रेंज की 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली का हिस्सा न मानने के केंद्रीय आदेश पर स्टे लगा दिया है। अदालत ने इस मामले पर खुद संज्ञान लिया था। सुनवाई के दौरान सरकार का पक्ष रखने वाले सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस विषय में गलत जानकारियां फैल रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई चीजों को स्पष्ट करने की आवश्यकता है, इसलिए मामले को संज्ञान में लिया गया है।
कोर्ट ने अरावली हिल्स की जांच के लिए एक हाई-पॉवर्ड कमिटी बनाने का आदेश दिया है, जिसमें डोमेन एक्सपर्ट्स शामिल होंगे। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि यह कमिटी हिल रेंज की संरचनात्मक और पारिस्थितिक अखंडता की विस्तृत जांच करेगी। कोर्ट ने निर्देश दिया कि कमिटी की सिफारिशों और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक किसी भी कार्रवाई को रोका जाएगा। अगली सुनवाई 21 जनवरी को होगी।
इससे पहले, 20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की अरावली हिल्स और रेंज की परिभाषा को मानने का फैसला किया था। उस फैसले में कहा गया था कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाले पहाड़ों को अरावली रेंज में शामिल नहीं किया जाएगा। इस परिभाषा के लागू होने से अरावली क्षेत्र के बड़े हिस्से में रेगुलेटेड खनन गतिविधियों के लिए रास्ता खुल सकता था।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चार अरावली राज्यों राजस्थान, गुजरात, दिल्ली और हरियाणा को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अरावली पर्वत श्रंखला का बड़ा हिस्सा राजस्थान में है, जबकि इसका एक छोर गुजरात और दूसरा दिल्ली में है। हरियाणा में भी इसका एक हिस्सा फैला हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अरावली की संरचना में खनन शुरू होने से यहां के वन्य जीवों और पेड़ों को खतरा हो सकता है, जिसे रोकने की आवश्यकता है।




