RegionalTop News

सरकारी स्कूलों के रंग को लेकर पंजाब सरकार पर सियासी रंग चढ़ाने के आरोप, 852 स्कूलों के पेंट फैसले से विवाद

चंडीगढ़: पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार एक बार फिर विवादों में आ गई है। राज्य के 852 सरकारी स्कूलों को नीले और पीले रंग में रंगने के फैसले ने सियासी बहस छेड़ दी है। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि ये रंग सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के झंडे से मेल खाते हैं और यह कदम शिक्षा के नाम पर राजनीतिक ब्रांडिंग की कोशिश है। वहीं सरकार का कहना है कि यह फैसला स्कूलों के सौंदर्यीकरण और एकरूपता के उद्देश्य से लिया गया है।

डायरेक्टर जनरल ऑफ स्कूल एजुकेशन (DGSE) की ओर से जारी आदेश के अनुसार, पहले चरण में राज्य के 23 जिलों के मिडिल, हाई और सीनियर सेकेंडरी स्कूलों को इस योजना में शामिल किया गया है। इसके तहत स्कूलों में रंग-रोगन और कलर कोडिंग की जाएगी, जिसके लिए कुल 17.44 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं। आदेश में स्कूलों की बाहरी दीवारों, बरामदों और गलियारों के लिए “एग कस्टर्ड” और “एनामेल रैप्सडी” रंग तय किए गए हैं, जबकि कक्षाओं की अंदरूनी दीवारों के लिए अलग रंग निर्धारित हैं। हालांकि, आदेश के साथ जारी तस्वीरों में स्कूलों की बाहरी संरचना नीले और पीले रंग में दिखाई दे रही है, जिससे विवाद और गहरा गया है।

आंकड़ों के मुताबिक, मुख्यमंत्री भगवंत मान के गृह जिले संगरूर में सबसे अधिक 102 स्कूल इस योजना के दायरे में आए हैं। शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस के गृह जिले रूपनगर में 37 स्कूलों का रंग-रोगन किया जाएगा। इसके अलावा अमृतसर में 84, लुधियाना में 70, जबकि पटियाला और फाजिल्का में 63-63 स्कूल शामिल हैं।

इस फैसले के बाद विपक्ष ने सरकार पर तीखा हमला बोला है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि सरकारी स्कूल किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं हैं और न ही बच्चों और शिक्षा संस्थानों का इस्तेमाल किसी पार्टी के प्रचार के लिए किया जाना चाहिए। उनका आरोप है कि पूरे राज्य के सरकारी स्कूलों को पार्टी के झंडे जैसे रंगों में रंगने का आदेश न केवल आपत्तिजनक है, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े करता है। वहीं, सरकार की ओर से इस आरोप को खारिज करते हुए कहा गया है कि इस पहल का मकसद केवल स्कूलों के बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाना और विद्यार्थियों के लिए आकर्षक शैक्षणिक माहौल तैयार करना है, न कि किसी तरह का राजनीतिक संदेश देना।

=>
=>
loading...
BRIJESH SINGH
the authorBRIJESH SINGH