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सावन में ऐसे करें शिवलिंग की पूजा, जानिए अभिषेक की सही विधि और किन बातों का रखें विशेष ध्यान

लखनऊ: सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। इस दौरान देशभर के शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूरे सावन महीने विधि-विधान से शिवलिंग का अभिषेक और पूजन करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर अपनी विशेष कृपा बरसाते हैं। ऐसे में जानिए शिवलिंग पूजन की सरल विधि, आवश्यक सामग्री और पूजा के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

शिवलिंग पूजन के लिए आवश्यक सामग्री

अभिषेक के लिए: शुद्ध जल, गंगाजल, कच्चा दूध, दही, देसी घी, शहद, शक्कर और गन्ने का रस। यदि सभी सामग्री उपलब्ध न हो तो केवल शुद्ध जल से भी अभिषेक किया जा सकता है।

पूजन सामग्री: बेलपत्र (3 या 11), धतूरा, भांग के पत्ते, शमी पत्र, आंकड़े के फूल, सफेद चंदन, भस्म, अक्षत, धूप, दीपक तथा फल या मिठाई।

शिवलिंग पूजन की सरल विधि

  • सुबह का समय पूजा के लिए सर्वोत्तम माना जाता है, हालांकि समयाभाव होने पर शाम को भी अभिषेक किया जा सकता है।
  • सबसे पहले तांबे के लोटे से शिवलिंग पर जल और गंगाजल अर्पित करें।
  • इसके बाद पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर) से अभिषेक करें। पंचामृत चढ़ाने के बाद दोबारा जल अवश्य अर्पित करें।
  • अभिषेक के दौरान “ॐ नमः शिवाय” या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते रहें।
  • यदि घर में पूजा कर रहे हैं तो अभिषेक के बाद शिवलिंग को साफ कपड़े से पोंछकर सफेद चंदन और भस्म से त्रिपुंड लगाएं तथा अक्षत अर्पित करें।
  • इसके बाद बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी पत्र और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें। यदि सभी सामग्री उपलब्ध न हो तो केवल बेलपत्र चढ़ाना भी शुभ माना जाता है।
  • अंत में भोग अर्पित करें, धूप-दीप जलाएं, भगवान शिव की आरती करें और पूजा में हुई भूल के लिए क्षमा प्रार्थना करें।

पूजा के दौरान इन बातों का रखें ध्यान

  • शिवलिंग पर दूध चढ़ाने के लिए तांबे के बर्तन का उपयोग न करें।
  • शिवलिंग पर हल्दी, सिंदूर या कुमकुम अर्पित नहीं करना चाहिए।
  • भगवान शिव को तुलसी के पत्ते नहीं चढ़ाए जाते।
  • शिवलिंग की पूर्ण परिक्रमा नहीं की जाती। जहां से अभिषेक का जल बाहर निकलता है, उस स्थान को लांघना वर्जित माना गया है। इसलिए शिवलिंग की आधी परिक्रमा करने की परंपरा है।

नोट: यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है। अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में पूजा-विधि में कुछ भिन्नताएं हो सकती हैं।

BRIJESH SINGH
the authorBRIJESH SINGH