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मोहन भागवत का बड़ा संदेश, बोले- भारत को मजबूत बनाने के लिए अपनी अस्मिता और एकता को पहचानना जरूरी

नागपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने विजयादशमी के अवसर पर नागपुर में अपने संबोधन के दौरान भारत की सांस्कृतिक पहचान, राष्ट्रीय एकता और देश के भविष्य को लेकर विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारत को संगठित और शक्तिशाली बनाने के लिए अपनी ऐतिहासिक विरासत, मूल्यों और राष्ट्रीय अस्मिता को समझना जरूरी है। उनके मुताबिक, देश की विविधताओं के बीच भावनात्मक एकता ही भारत की सबसे बड़ी ताकत है।

अपनी पहचान भूलने से कमजोर हुआ भारत: मोहन भागवत

मोहन भागवत ने कहा कि भारत की राष्ट्रीय एकता का आधार यहां की साझा सांस्कृतिक चेतना और एक-दूसरे के प्रति अपनेपन का भाव रहा है। उनका कहना था कि भारत में भाषा, जाति, पंथ और परंपराओं के स्तर पर व्यापक विविधता होने के बावजूद देश लंबे समय तक एक राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ता रहा। इसकी वजह समाज में मौजूद एकता की भावना थी।संघ प्रमुख ने कहा कि जब देश अपनी मूल पहचान और परंपराओं से दूर हुआ, तब समाज में विभाजन और कमजोरी बढ़ी। उन्होंने भारत के ऐतिहासिक संघर्षों का जिक्र करते हुए कहा कि देश को लंबे समय तक विदेशी शासन का सामना करना पड़ा। स्वतंत्रता के लिए अनेक महापुरुषों ने संघर्ष किया और अपना बलिदान दिया। अब देश को एकता और प्रगति के रास्ते पर आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी समाज की है।

स्वतंत्रता के दौर से ज्यादा समर्पण की जरूरत

संघ प्रमुख ने कहा कि देश की आजादी के समय परिस्थितियां अलग थीं। उस दौर में स्वतंत्रता हासिल करने के लिए समाज और महापुरुषों ने जिस स्तर का त्याग और समर्पण किया, आज की चुनौतियों से निपटने के लिए उससे भी अधिक प्रयास करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि भारत जैसे विविधताओं से भरे देश को एकजुट रखने के लिए ऐसा आधार आवश्यक है, जो सभी समुदायों, परंपराओं और विचारों को स्वीकार करने के साथ उनके सम्मान और सुरक्षा का भी ध्यान रखे। भागवत के मुताबिक, भारत की पारंपरिक विचारधारा में विविधताओं को स्वीकार करने और सभी के प्रति सम्मान का भाव रखने की विशेषता रही है।

परंपराओं को बचाने के साथ बदलाव भी जरूरी

मोहन भागवत ने कहा कि समाज को अपनी शाश्वत परंपराओं और मूल्यों को बनाए रखना चाहिए, लेकिन समय के साथ बदलने वाली व्यवस्थाओं में जरूरी सुधार भी होने चाहिए। उन्होंने भाषा, जाति और पंथ के प्रति लगाव को स्वाभाविक बताते हुए कहा कि इन पहचानों के साथ देश के प्रति भावनात्मक जुड़ाव को भी प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की परंपरा पूरी दुनिया को अपना परिवार मानने की रही है। हालांकि, समय के साथ समाज में कुछ ऐसी बंदिशें विकसित हुईं, जिन्होंने उसके विस्तार और सामर्थ्य को प्रभावित किया। भागवत ने कहा कि अपनी पहचान को समझने के साथ समाज को आपसी सहयोग और एक-दूसरे के हितों का ध्यान रखते हुए आगे बढ़ना होगा।

दुनिया की चुनौतियों के बीच भारत से उम्मीदें

संघ प्रमुख ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का महत्व बढ़ रहा है और दुनिया में देश को लेकर दिलचस्पी भी बढ़ी है। उन्होंने वैश्विक परिस्थितियों का जिक्र करते हुए कहा कि आर्थिक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव, पर्यावरणीय संकट और वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियां लगातार गंभीर हो रही हैं। उन्होंने परिवार व्यवस्था में बदलाव और नई पीढ़ी के संस्कारों से जुड़ी चिंताओं का भी उल्लेख किया। भागवत के अनुसार, भौतिक रूप से संपन्न होने के बावजूद दुनिया के कई देश सामाजिक और वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।उन्होंने कहा कि भारत के पास अपनी परंपराओं और विचारधारा के आधार पर इन समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने की क्षमता है। ऐसे में देश की प्रगति के साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि भारत अपनी मूल पहचान, सांस्कृतिक मूल्यों और एकता की भावना को मजबूत बनाए रखे।

BRIJESH SINGH
the authorBRIJESH SINGH