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ब्रह्माकुमारी सुमन बहन ने बताया, जन्माष्टमी का आध्यात्मिक रहस्य

लखनऊ| ब्रह्माकुमारीज जानकीपुरम लखनऊ में श्री कृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव बड़े ही धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर श्री राजकुमार कमांडेंट आइटीबीपी, श्री नरेंद्र कश्यप सीईओ सिनर्जी इन्फो, ने दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया I मुख्य संचालिका बी0 के0 सुमन दीदी ने बताया कि हरेक माता अपने बच्चे को नयनों का तारा और दिल का दुलारा समझती है, परन्तु फिर भी वह श्रीकृष्ण को सुंदर, मनमोहन, चित्तचोर आदि नामों से पुकारती है। वास्तव में श्रीकृष्ण का सौंदर्य चित्त को चुरा ही लेता है। जन्माष्टमी के दिन जिस बच्चे को मोर मुकुट पहनाकर, मुरली हाथ में देते हैं, लोगों का मन उस समय उस बच्चे के नाम, रूप, देश व काल को भूल कर कुछ क्षणों के लिए श्रीकृष्ण की ओर आकर्षित हो जाता है। सुंदरता तो आज भी बहुत लोगों में पाई जाती है परंतु श्रीकृष्ण सर्वांग सुंदर थे, सर्वगुण सम्पन्न, सोलह कला सम्पूर्ण थे। ऐसे अनुपम सौंदर्य तथा गुणों के कारण ही श्रीकृष्ण की पत्थर की मूर्ति भी चित्तचोर बन जाती है।

कहा जाता है कि श्रीकृष्ण ने द्वापर युग में महाभारत युद्ध करवाया जिससे आसुरी दुनिया का नाश हुआ और स्वर्ग की स्थापना हुई। परन्तु द्वापर युग के बाद तो कलियुग अर्थात् कलह-क्लेश का युग ही आया। इसमें तो और ही पाप तथा भ्रष्टाचार बढ़ा, स्वर्ग की स्थापना कहाँ हुई? विचार कीजिए कि यदि अपवित्र दृष्टि, वृत्ति वाले लोग जैसे कंस, जरासंध, शिशुपाल आदि पावन श्रीकृष्ण को देख सकते हैं तो उनकी एक झलक के लिए भक्तों को नवधा भक्ति और संन्यासियों को घोर तपस्या करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? यदि श्रीकृष्ण की दुनिया में भी इतने पाप और दुष्ट व्यक्ति थे तो आज की दुनिया को ही नर्क क्यों कहा जाए? वास्तविकता यह है कि श्रीकृष्ण की दुनिया में कंस, जरासंध, शिशुपाल जैसे आसुरी वृत्ति वाले लोग थे ही नहीं और न ही उस समय कोई पाप अथवा भ्रष्टाचार का नामोनिशान था क्योंकि श्रीकृष्ण का जन्म तो द्वापर में नहीं, बल्कि सतयुग के आरम्भ में हुआ था।

अतः श्रीकृष्ण से सचमुच प्यार है और उसके वैकुण्ठ में आप जान चाहते हैं तो पूर्ण पवित्र बनो क्योंकि विकारी और आसुरी स्वभाव वाली आत्माएँ वैकुण्ठ में नहीं जा सकती और उनका श्रीकृष्ण के साथ कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता क्योंकि श्रीकृष्ण तो सर्वगुण सम्पन्न, सोलह कला सम्पूर्ण और सम्पूर्ण अहिंसक थे। अतः देखना चाहिए कि अपने में कहाँ तक दैवी गुण धारण किए हैं और पवित्रता की कितनी कलाएँ अपनाई हैं। अपनी धारणा की ओर ध्यान दिए बिना तो देव गणों की भक्ति से भी कोई विशेष फल नहीं मिलता। कार्यक्रम में सतयुगी राज दरबार, कृष्ण की लीलाओं का मंचन, तथा झांकी का विशेष आकर्षण रहा I इस अवसर पर श्रीमती ज्योति कश्यप, श्री जेपी मौर्य, श्री पी० एन० कपूर एवं अन्य गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित थे।

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BRIJESH SINGH
the authorBRIJESH SINGH