सुप्रीम कोर्ट में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के व्यक्तिगत रूप से पेश होकर दलीलें देने को लेकर अब विवाद खड़ा हो गया है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में एक नई अर्जी दाखिल की गई है, जिसमें किसी मौजूदा मुख्यमंत्री के इस तरह अदालत में पेश होने की उपयुक्तता पर सवाल उठाए गए हैं। यह अर्जी अखिल भारत हिंदू महासभा के उपाध्यक्ष सतीश कुमार अग्रवाल की ओर से दाखिल की गई है। अर्जी में कहा गया है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की व्यक्तिगत उपस्थिति कोर्ट पर “प्रतीकात्मक दबाव” बना सकती है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इतने बड़े संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने से बचना चाहिए।
गौरतलब है कि पिछले सप्ताह ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में खुद उपस्थित हुई थीं और पश्चिम बंगाल में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर दायर याचिका पर अपनी बात रखी थी। यह मामला वोटर लिस्ट के विशेष पुनरीक्षण से जुड़ा हुआ है। अर्जी में कहा गया है कि यह मामला किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि पूरे राज्य से संबंधित है। ऐसे में मुख्यमंत्री को निजी तौर पर नहीं, बल्कि राज्य सरकार की ओर से नियुक्त वकीलों के माध्यम से ही पक्ष रखना चाहिए था। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि राज्य सरकार पहले से ही अपने वकीलों के जरिए कोर्ट में मौजूद थी, इसलिए मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत पेशी की कोई आवश्यकता नहीं थी।
इसके अलावा अर्जी में यह सवाल भी उठाया गया है कि क्या ममता बनर्जी को इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर करने का अधिकार था, क्योंकि इसमें उनके किसी मौलिक अधिकार के उल्लंघन का उल्लेख नहीं किया गया है। इस अर्जी पर कल मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ सुनवाई करेगी। वहीं, पश्चिम बंगाल के SIR मामले से जुड़ी अन्य याचिकाओं पर भी सुप्रीम कोर्ट में 9 फरवरी को सुनवाई होनी है। पिछली सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी स्वयं अदालत में मौजूद थीं और उन्होंने अपनी याचिका पर खुद बहस करने की अनुमति मांगी थी। हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने उन्हें अपने वकील के माध्यम से बहस करने की सलाह दी थी।
सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि माइक्रो ऑब्जर्वर नियुक्त कर केवल पश्चिम बंगाल को निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को बचाना जरूरी है। ममता का दावा है कि पहले चरण में 58 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए, जिनके खिलाफ फॉर्म-6 के जरिए अपील का कोई मौका नहीं मिला। वहीं दूसरे चरण में 1.30 करोड़ नाम हटाए गए। उन्होंने सवाल उठाया कि जब दूसरे राज्यों में अलग सिस्टम है, तो केवल बंगाल में ही इस तरह की कार्रवाई क्यों की जा रही है। उन्होंने इसे बंगाल के लोगों पर “बुलडोजर चलाने” जैसा कदम बताया।




