नई दिल्ली। इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। देश की सर्वोच्च अदालत ने उनके द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया है। जस्टिस वर्मा ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें न्यायाधीश पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू करने और जांच समिति गठित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई थी।
यह मामला कथित कैशकांड से जुड़ा है, जिसमें जस्टिस यशवंत वर्मा का नाम सामने आया था। सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका पर सुनवाई पूरी होने के बाद सोमवार को फैसला सुरक्षित रखा गया था, जिसे आज सुनाते हुए अदालत ने उनकी दलीलों को स्वीकार नहीं किया।
अपनी याचिका में जस्टिस वर्मा ने तर्क दिया था कि किसी जज को हटाने की प्रक्रिया तभी आगे बढ़ सकती है, जब संबंधित प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा से पारित हो जाए। उन्होंने कहा था कि अभी तक यह प्रस्ताव केवल लोकसभा में ही पारित हुआ है और राज्यसभा की मंजूरी के बिना जांच समिति का गठन नहीं किया जा सकता। उनका यह भी कहना था कि लोकसभा अध्यक्ष को अकेले जांच समिति बनाने का अधिकार नहीं है।
गौरतलब है कि कैशकांड सामने आने के समय जस्टिस यशवंत वर्मा दिल्ली हाईकोर्ट में तैनात थे। मार्च 2025 में उनके सरकारी आवास पर आग लगने की घटना हुई थी। आग बुझाने के दौरान दमकल कर्मियों को वहां से जले हुए नोटों की गड्डियां मिली थीं, जिनका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ था। उस समय यह बताया गया था कि घटना के वक्त जज घर पर मौजूद नहीं थे।
इस विवाद के बाद जस्टिस वर्मा का तबादला दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया था। तभी से उनके खिलाफ पद से हटाने की प्रक्रिया को लेकर लगातार कदम उठाए जा रहे हैं।




