सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि आध्यात्म क्या है। तुम अपने इस शरीर के जन्म से पहले क्या थे, और मृत्यु के बाद क्या रहोगे— इन्हीं प्रश्नों की खोज और समझ को आध्यात्म कहा जा सकता है। न किसी को अपना पूर्वजन्म याद है, न ही कोई मृत्यु के बाद लौटकर प्रमाण दे पाया है। इसलिए जो भी कहा जा रहा है, उसे अंतिम सत्य मान लेने से पहले तर्क, अनुभव और विवेक की कसौटी पर परखना ही एकमात्र ईमानदार मार्ग है। अनेक धर्म हैं, और हर धर्म का अपना ईश्वर भी है, अपना शैतान भी। यदि सबमें एक ही शैतान होता, तो कहा जा सकता था कि सब एक ही सत्य की ओर इशारा कर रहे हैं। पर जब दानव भी अलग-अलग हैं, तो यह स्पष्ट है कि ये सब मनुष्य की समझ के ढाँचे हैं, परम सत्य स्वयं नहीं। यह संसार “मैं”से शुरू होता है। मैं हूँ तो संसार है, मैं नहीं तो संसार नहीं। भक्त है तो भगवान है, अनुभूति है तो परमात्मा है। जब तक यह शरीर है, तभी तक समझ है। और इसी समझ से हम जीवन में आगे बढ़ते हैं। इसलिए जिसने भी मुझे समझ दी, मेरे भीतर विवेक जगाया, मेरे भ्रम काटे— वही मेरे लिए परमात्मा है, वही अल्लाह है, वही गॉड है। परमात्मा को इतना मान लेना ही एक पृष्ठ का सम्पूर्ण आध्यात्म है। अधिक उलझने की ज़रूरत नहीं। विवेक के तराज़ू को हाथ में पकड़े रहो, और अपने जीवन-कर्तव्य को पूरी ईमानदारी से जियो। जिसने मुझे समझ दी, वही परमात्मा है, वही अल्लाह है, वही गॉड है। यह कोई मत नहीं, यह एकता की भूमि है। क्योंकि जैसे ही यह भाव आता है, यह स्पष्ट हो जाता है कि सबके पास समझ है। और जिसने मुझे यह समझ दी,उसी ने दूसरे को भी दी है। अर्थात दोनों का परमात्मा एक ही है,केवल नाम अलग-अलग हैं।
आप मूल पशु-मानवता (Fundamental Animal Humanity) को कैसे देखते हैं, और यह आध्यात्मिकता से कैसे जुड़ता है?
जब जीवन की संभावनाएँ बनीं, तब उत्क्रान्ति (Evolution) की प्रक्रिया शुरू हुई। अनेक प्रजातियाँ बनीं, जिनमें मनुष्य भी एक है। भूख, नींद, सुरक्षा, समूह, प्रेम, निष्ठा — ये सभी प्रवृत्तियाँ हमें हर जीव में दिखाई देती हैं, किसी में कम, किसी में अधिक। ये सब प्रवृत्तियाँ संसार में जीवन को बनाए रखने के लिए ही बनी हैं। यदि भूख का अनुभव न हो, तो भोजन की आवश्यकता होते हुए भी हम खाएँगे नहीं और मर जाएँगे। खतरा दिखे या महसूस हो, तो सतर्कता अपने आप आ जाती है। ये सब मूलभूत भावनाएँ हैं जो सभी प्राणियों में हैं। पशु के लिए न पाप होता है, न पुण्य। वह आता है, जीवन जीता है, और समय पूरा होने पर चला जाता है। पर मनुष्य के मन में पाप–पुण्य, सही–गलत, नैतिकता का बोध है। जैसे हर व्यक्ति की उँगलियों के निशान अलग होते हैं पर हाथ का आकार एक जैसा, वैसे ही सबका मस्तिष्क दिखने में समान है पर उसके भीतर का न्यूरल नेटवर्क अलग है। सबके भीतर रासायनिक संतुलन (chemical balance) है, पर वह भी हर व्यक्ति में अलग है। न्यूरल नेटवर्क की बनावट और रासायनिक संतुलन — ये दोनों मिलकर हमारी भावनाओं को नियंत्रित करते हैं। इसलिए पाप–पुण्य और सही–गलत से ऊपर उठकर यह समझना आवश्यक है कि जो भावनाएँ उठती हैं, वे हमारी “आत्मा” की नहीं, हमारे शरीर की संरचना के साथ मिली हुई प्रवृत्तियाँ हैं। और जब मनुष्य यह देखने लगता है कि भावनाएँ “मैं” नहीं हैं, बल्कि शरीर-मन की जैविक प्रक्रियाएँ हैं, तब वह उन पर नियंत्रण भी सीखने लगता है। यहीं से आध्यात्म शुरू होता है — पशु-स्वभाव को न दबाकर, न उसे पवित्र या पापी मानकर, बल्कि उसे *समझकर उससे ऊपर उठने की चेतना* से।
आप आध्यात्म को चेतना का विज्ञान क्यों मानते हैं?
जो हमें दिखाई देता है, वह या तो ऊर्जा है या तत्व।जो दिखाई नहीं देता, वही चेतना है। हम तत्वों को सजीव और र्जीव में बाँट देते हैं, पर गहराई से देखें तो हर तत्व अपने निश्चित नियम और व्यवहार के साथ इस संसार में प्रकट हो रहा है। पानी कहीं भी हो, पानी ही रहता है। कोयला कहीं भी हो, कोयला ही रहता है। पानी 100°C पर, एक वायुमंडलीय दबाव में ही उबलता है। लोहे को कितनी बार पिघलाओ और ठंडा करो, वह अपने मूल रूप में नियम के अनुसार लौट आता है। नियम को मानना और नियम के अनुसार चलना बिना चेतना के संभव नहीं है। इसलिए चेतना हर तत्व में विद्यमान है। मनुष्य आज जो है, वह भी इसी चेतना के नियमों से गढ़ा गया है। पर जब वह बाहरी कथाओं, विश्वासों और धारणाओं को कुछ समय के लिए शांत कर अपने मन को एकाग्र करता है, तो उसे अपनी शुद्ध चेतना का साक्षात्कार होने लगता है। इसीलिए आध्यात्म कोई आस्था नहीं, बल्कि *चेतना का विज्ञान* है — उस मूल सत्ता को जानने का विज्ञान जो तत्वों, ऊर्जा और जीवन सबके भीतर एक-सी कार्य कर रही है।
आपके लिए मंत्र, जप और साधना का क्या महत्व है?
हम जो अनुभव करते हैं, उसी को शब्दों में बदलकर दूसरों से साझा करते हैं। और जब कोई शब्द सुनते हैं, तो उसके अर्थ के साथ एक भाव हमारे भीतर जागता है। मंत्र भी शब्दों से ही बना होता है। जब हम उसके अर्थ को समझकर जप करते हैं, तो वह मन को एकाग्र करने में सहायता करता है। अधिकांशतः मंत्र-जप को मन को शांत करने के साधन के रूप में देखा जाता है, चाहे वह किसी आराध्य का नाम ही क्यों न हो। पर मेरे अनुभव में शब्द सीधे भावनाओं को नियंत्रित करते हैं, और जैसे-जैसे शब्द कम होते जाते हैं, मन भी स्वतः शांत होने लगता है। इसी अनुभव से मैंने अपना एक निजी मंत्र बनाया और उसका जप करने लगा। मुझे जो चाहिए था, उसे सीधे शब्दों में ही दोहराना शुरू किया ।वह मंत्र था— “ख़ाली मन”यह कोई दैवी या पारंपरिक मंत्र नहीं था, पर इसका प्रभाव सीधा और गहरा था।“ख़ाली मन” का जप धीरे-धीरे मेरी साधना बन गया, जिसे मैं निरंतर अपने भीतर दोहराने लगा। इस प्रकार मेरे लिए मंत्र, जप और साधना का अर्थ है— शब्दों के माध्यम से मन को उसकी मूल शांति की ओर लौटाना।
आप भावनात्मक संतुलन और साक्षी-भाव को कैसे प्राप्त करते हैं?
इच्छा हर चीज़ की जननी है। भावनात्मक संतुलन का अर्थ यह नहीं कि मन हमेशा एक-सी अवस्था में स्थिर रहे। इसका अर्थ यह है कि परिस्थितियाँ बदलें, पर वे व्यक्ति पर हावी न हों। यह केवल अभ्यास से ही संभव है। दुःख आएगा तो दुःख होगा, सुख आएगा तो मन प्रसन्न भी होगा। पर जो उठता है —उसे पूरी तरह बह जाने न दिया जाए।चाहे दुःख का आवेग हो या सुख का, उसे भीतर देखा जाए, पर उसे अपने ऊपर शासन न करने दिया जाए। जो क्रोध और काम के आवेग को रोक ले, उसी को योगी कहा गया है। यह अवस्था एक बार मिल जाने के बाद स्थायी रूप से बनी रहे — ऐसा नहीं होता। इसे बार-बार साधना पड़ता है, बार-बार साक्षी बनकर लौटना पड़ता है। किसी भी प्राणी का, विशेषकर मनुष्य का, सबसे पहला जीवन-कर्तव्य यही है कि वह पूर्ण भावनात्मक संतुलन (Total Emotional Balance) की दिशा में बढ़े।
आप रूप से परे निराकार चेतना को कैसे अनुभव करते हैं?
जब सारे विचार शांत हो जाते हैं और शब्द गिर जाते हैं, तब जो शांति प्रकट होती है, उसी में निराकार चेतना का अनुभव होता है। यह अनुभव पूरी तरह व्यक्तिगत है। इसे शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता। क्योंकि जैसे ही हम उसे शब्दों में बाँधते हैं, वह अनुभव नहीं रह जाता, एक कहानी, एक धारणा, एक स्मृति बन जाता है। निराकार चेतना न कहने में है, न सोचने में, न समझाने में— वह केवल “होने” में है।
आप मन की यांत्रिक प्रतिक्रियाओं का साक्षात् दर्शन कैसे करते हैं?
यंत्र हमारा मस्तिष्क है, और मन वह धरातल है जहाँ अनुभूतियाँ जन्म लेती हैं और शब्दों का रूप धारण करती हैं। अवचेतन मन एक हार्ड-डिस्क की तरह है, जहाँ अनुभूति, स्मृतियाँ, संस्कार और अनुभव संग्रहित रहते हैं। यही संचित सामग्री मन की सतह पर बार-बार विचारों और प्रतिक्रियाओं के रूप में उभरती रहती है। जब यह स्पष्ट हो जाता है कि विचार भी शरीर-तंत्र की ही एक स्वचालित प्रक्रिया हैं,तो उनका प्रभाव स्वतः ढीला पड़ने लगता है। तब वे “मैं” नहीं रह जाते, केवल “हो रही घटनाएँ” बन जाते हैं। यह किसी विशेष देखने की क्रिया से नहीं, बल्कि सीधे अनुभव से स्पष्ट होता है कि—“अभी इस शरीर-मन में यह प्रक्रिया घट रही है।”यहीं से साक्षी-भाव का जन्म होता है। विचार आते-जाते रहते हैं, भाव उठते-गिरते रहते हैं, पर भीतर कोई उनसे बँधा नहीं रहता। केवल उनकी यांत्रिक गति का शांत, स्पष्ट और बिना हस्तक्षेप के साक्षात् दर्शन होता रहता है। इसलिए अपने मन में उठ रहे विचारों को अपने ऊपर हावी न होने दें, और अपनी भावनाओं से ऊपर उठकर साक्षी-भाव में स्थित रहें।
आप अपने भीतर सर्वोच्च ब्रह्माण्डीय चेतना का अनुभव कैसे करते हैं?
सर्वोच्च ब्रह्माण्डीय चेतना एक बोध है— कि यदि प्रत्येक तत्व में चेतना है, तो समस्त चेतनाओं का स्रोत एक ही सार्वभौमिक चेतना है। जब हम “सर्वोच्च ब्रह्माण्डीय चेतना” कहते हैं, तो उसके साथ एक पूर्णता का भाव जुड़ा होता है— जैसे कुछ अलग बचा ही नहीं, सब उसी में समाहित है। जब भीतर साक्षी-भाव स्थिर हो जाता है, तो नाम भी अर्थहीन हो जाते हैं। क्योंकि जो कुछ भी हम कहते हैं, वह शब्दों के माध्यम से ही कहते हैं। और साक्षी-भाव के बाद शब्द टिकते नहीं। जब शब्द नहीं रहते, तो नाम का भी कोई अर्थ नहीं रह जाता। तब अनुभव ही शेष रहता है— निराकार, निरपेक्ष, पूर्ण। उसी को तुम “सर्वोच्च ब्रह्माण्डीय चेतना” कह रहे हो।
आप स्वयं को गुरु नहीं, बल्कि रचयिता का अंश क्यों मानते हैं?
क्योंकि जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, जो कुछ भी घट रहा है, वह सब सर्वोच्च ब्रह्माण्डीय चेतना की ही अभिव्यक्ति है। जब मैं कुछ भी नहीं कर रहा होता, तब भी हृदय धड़क रहा होता है, रक्त बह रहा होता है,श्वास चल रही होती है। यह सब मेरी “इच्छा” से नहीं, किसी गहरी सार्वभौमिक सत्ता के नियम से हो रहा है। भले ही मैं स्वयं को नास्तिक कहूँ, फिर भी इस व्यवस्था को किसी नाम के बिना संबोधित नहीं कर पाता। क्योंकि अनुभव नाम से पहले आता है। जब मेरा व्यक्तिगत अस्तित्व कुछ वर्षों और कुछ शब्दों तक ही सीमित है, तो “मैं गुरु हूँ” कहना मुझे असत्य जैसा लगता है। उससे अधिक सत्य यह है कि मैं उस अनंत रचयिता की चेतना का एक छोटा-सा अंश हूँ। इसलिए गुरु होने का दावा नहीं, केवल इतना बोध है— मैं रचयिता का अंश हूँ, स्रोत नहीं।
आपका संदेश क्या है जो आप लोगों को देना चाहते हैं?
सर्वोच्च ब्रह्माण्डीय चेतना चाह रही है, ऊर्जा रूप बदल रही है, और तत्व नृत्य कर रहे हैं। तुम चेतना, ऊर्जा और तत्व से बने हो। और ये तीनों केवल अपने-अपने रूप बदल रहे हैं। तुम्हारी चेतना, तुम्हारी ऊर्जा, तुम्हारे तत्व इसी धरती पर पहले भी थे और सदा रहेंगे। तुम असंख्य कणों से बने हो, और इन्हीं कणों से पहले भी अनेकों शरीर बने होंगे, और तुम्हारे बाद भी तुम्हारा यह शरीर टूटकर अनगिनत नए रूपों में ढल जाएगा। रूप बदलते रहेंगे, पर चेतना, ऊर्जा और तत्व न कभी नष्ट होते हैं, न कभी अलग होते हैं। इसलिए अपने आप को केवल एक देह मत समझो। तुम परिवर्तन हो, तुम प्रवाह हो, तुम वही चेतना हो जो हर रूप में स्वयं को व्यक्त कर रही है।






