नई दिल्ली: स्टूडेंट एक्टिविस्ट आकृति चौधरी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत में लेने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा की तत्कालीन डीएम मेधा रूपम की भूमिका पर सुनवाई की। अदालत ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि अगर हिरासत का प्रस्ताव कई अधिकारियों की जांच और मंजूरी के बाद डीएम तक पहुंचा था, तो सिर्फ डीएम को इस पूरी प्रक्रिया के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं हो सकता। जस्टिस एससी शर्मा और जस्टिस एनके सिंह की पीठ ने मेधा रूपम की याचिका पर सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।
क्या है पूरा मामला?
आकृति चौधरी की NSA के तहत हुई हिरासत को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने मामले में नोएडा की तत्कालीन डीएम मेधा रूपम की भूमिका पर भी टिप्पणी की थी और उनके वेतन से 5 लाख रुपये काटकर आकृति चौधरी को मुआवजा देने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट के इसी आदेश को मेधा रूपम ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य सवाल डीएम की व्यक्तिगत भूमिका और हिरासत की पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया को लेकर उठा।
सरकार की ओर से क्या दलील दी गई?
उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत में दलील दी कि डीएम ने अपने स्तर पर सीधे हिरासत का फैसला नहीं लिया था। उनके मुताबिक, हिरासत से संबंधित रिपोर्ट कई अधिकारियों की प्रक्रिया से गुजरने के बाद डीएम के सामने पहुंची थी। उन्होंने बताया कि मामले में पुलिस के अलग-अलग स्तर के अधिकारियों ने रिपोर्ट पर विचार किया था। इसके अलावा NSA के तहत गठित सलाहकार बोर्ड ने भी हिरासत के मामले की समीक्षा की थी।
मेधा रूपम की ओर से क्या कहा गया?
मेधा रूपम की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि डीएम के सामने मामला पहुंचने से पहले करीब पांच स्तरों पर प्रक्रिया पूरी हुई थी। दलील दी गई कि डीएम की भूमिका उपलब्ध रिकॉर्ड और संबंधित कानूनी प्रावधानों के आधार पर अपनी राय बनाने की थी। उनका पक्ष था कि पूरी प्रक्रिया को नजरअंदाज कर केवल डीएम को व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि अगर हिरासत का निर्णय लेने की प्रक्रिया कई स्तरों से होकर गुजरी थी और अलग-अलग अधिकारियों ने उस पर विचार किया था, तो सिर्फ डीएम को अलग करके जिम्मेदार ठहराने का सवाल उठता है। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसी स्थिति में केवल डीएम को 5 लाख रुपये के मुआवजे के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित है या नहीं, इस पर विचार करना होगा। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतजार है।
कौन हैं मेधा रूपम?
मेधा रूपम 2014 बैच की IAS अधिकारी हैं। वह नोएडा की पहली महिला जिलाधिकारी के तौर पर भी काम कर चुकी हैं। मूल रूप से आगरा की रहने वाली मेधा रूपम ने अपनी शुरुआती पढ़ाई केरल में की। इसके बाद उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के सेंट स्टीफंस कॉलेज से इकोनॉमिक्स में पढ़ाई की। उन्होंने 2014 की UPSC सिविल सेवा परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 10 हासिल की थी। नोएडा की जिम्मेदारी संभालने से पहले वह उत्तर प्रदेश के कई जिलों में प्रशासनिक पदों पर काम कर चुकी हैं। इनमें बरेली, मेरठ, हापुड़ और कासगंज जैसे जिले शामिल हैं।




