लखनऊ: उत्तर प्रदेश के गोंडा में बर्तन व्यापारी विनोद साहनी की हत्या के बाद प्रदेश की पिछड़े वर्ग की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। निषाद समुदाय से आने वाले विनोद साहनी की हत्या के बाद लखनऊ से लेकर गोंडा तक राजनीतिक गतिविधियां बढ़ गई हैं। खास बात यह रही कि लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज की मोर्चरी के बाहर विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं के साथ प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री संजय निषाद भी धरने पर बैठे नजर आए। एक तरफ समाजवादी पार्टी और वीआईपी पार्टी के कार्यकर्ता सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे, तो दूसरी तरफ निषाद पार्टी के अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री संजय निषाद भी कार्रवाई की मांग को लेकर धरने पर बैठे। शुक्रवार को संजय निषाद गोंडा में भी धरने पर बैठे और पीड़ित परिवार के पक्ष में आवाज उठाई।
निषाद वोट पर क्यों टिकी नजर?
विनोद साहनी हत्याकांड के बाद संजय निषाद के तेवर को 2027 के विधानसभा चुनाव से जोड़कर भी देखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में निषाद समुदाय को एक प्रभावशाली पिछड़ा वर्ग माना जाता है। दावा किया जाता है कि राज्य में निषाद मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब चार फीसदी है और गंगा नदी के आसपास के कई जिलों में इनका अच्छा प्रभाव है। गोरखपुर, महराजगंज, देवरिया, मिर्जापुर, प्रयागराज और वाराणसी समेत कई इलाकों में निषाद मतदाताओं की संख्या महत्वपूर्ण मानी जाती है। करीब 100 विधानसभा सीटों पर निषाद वोट चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकता है।
वोट बैंक बचाने की चुनौती में संजय निषाद
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले विनोद साहनी की हत्या ने संजय निषाद के सामने अपने समुदाय के बीच मजबूत संदेश देने की चुनौती खड़ी कर दी है। खासतौर पर तब, जब मामले को लेकर आरोपियों की जातीय पहचान को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी शुरू हो गई है। संजय निषाद ने 2016 में निषाद पार्टी का गठन किया था। पार्टी ने 2017 का विधानसभा चुनाव पीस पार्टी के साथ मिलकर लड़ा और 72 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, जिसमें एक सीट पर जीत मिली। इसके बाद 2018 के गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में समाजवादी पार्टी ने निषाद पार्टी के संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद को उम्मीदवार बनाया। प्रवीण निषाद ने बीजेपी के कब्जे वाली सीट सपा गठबंधन के खाते में डाल दी। हालांकि, 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले संजय निषाद ने बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया। फिलहाल वह प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं।
निषादों को साधने में जुटी समाजवादी पार्टी
वहीं समाजवादी पार्टी भी इस पूरे घटनाक्रम के जरिए निषाद समुदाय के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करती नजर आ रही है। अखिलेश यादव के PDA फॉर्मूले में पिछड़े वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका है। सपा का संदेश है कि पार्टी निषाद समुदाय के साथ अन्याय के खिलाफ खड़ी होगी। इसी कड़ी में पार्टी के पिछड़ा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष राजपाल कश्यप लखनऊ में धरने पर बैठे और बाद में गोंडा पहुंचकर पीड़ित परिवार से मुलाकात की।
2022 में NDA के साथ था बड़ा हिस्सा
2022 के विधानसभा चुनाव को लेकर सामने आए एक सर्वे के मुताबिक, करीब 63 फीसदी निषाद मतदाताओं ने बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के पक्ष में वोट किया था, जबकि करीब 22 फीसदी ने सपा और उसके सहयोगी दलों का समर्थन किया था। अब बीजेपी और उसके सहयोगियों के सामने अपने पुराने निषाद वोट बैंक को बनाए रखने की चुनौती है। वहीं, लोकसभा चुनाव के बाद मजबूत स्थिति में आई समाजवादी पार्टी निषाद मतदाताओं के बीच अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
निषाद वोट से जुड़ा रामायण का प्रतीक भी अहम
निषाद समुदाय की राजनीतिक और सामाजिक पहचान में रामायण से जुड़े प्रसंगों का भी खास महत्व माना जाता है। मान्यता है कि वनवास के दौरान भगवान राम की मुलाकात श्रृंगवेरपुर में निषादराज से हुई थी और केवट ने उन्हें गंगा पार कराई थी। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले विनोद साहनी हत्याकांड ने निषाद राजनीति को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। अब बड़ा सवाल यही है कि चुनावी मैदान में निषाद समुदाय किसके साथ खड़ा होता है और 2027 में किसकी नैया पार लगाने में निर्णायक भूमिका निभाता है।




