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भारतीय फिल्मों में 70 के दशक के हॉलीवुड की लहर : फेवरेओ

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सुगंधा रावल

लॉस एंजेलिस | वे कभी भारत नहीं आए, लेकिन हिंदी फिल्मों से बखूबी वाकिफ हैं। हॉलीवुड के जाने-माने निर्देशक जॉन फेवरेओ का कहना है कि भारतीय फिल्मों में एक नया आंदोलन शुरू हो गया है जिसमें निर्देशक द्वारा संचालित आजाद फिल्में बन रही हैं जिसमें एक अद्वितीय दृष्टि होती है। उनके मुताबिक, कुछ ऐसा ही हॉलीवुड में 70 के दशक में देखने को मिला था। 1970 के दशक को हॉलीवुड का ‘स्वर्णकाल’ कहा जाता है इसे अक्सर न्यू हॉलीवुड इरा या द अमेरिकन न्यू वेब के नाम से जाना जाता है। यह वह वक्त था जब अमेरिकन फिल्म जगत में अत्यधिक रचनात्मकता देखने को मिली थी।

जब युवा निर्देशक नए-नए विषयों के साथ कई सारे प्रयोग में जुटे थे जिन्होंने समाज को बदल कर रख दिया। इस दौर की कुछ यादगार फिल्में हैं- ‘द गॉडफादर’, ‘चाइनाटाउन’, ‘फाइव इजी पीसेज’, ‘द डीयरहंटर’, ‘एपोक्लेप्से नाओ’ और ‘बीइंग देयर’ आदि। फेवरेओ को उनकी ‘आयरन मैन’ और ‘शेफ’ जैसी फिल्मों के लिए जाना जाता है। उन्होंने खासतौर से अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ का उल्लेख करते हुए आईएएनएस को बताया, “भारतीय सिनेमा अभी बदलाव के दौर से गुजर रहा है। वहां कई बेहतरीन फिल्में निकल कर आ रही हैं। नए दौर की यह फिल्में निर्देशक संचालित और अधिक स्वतंत्र हैं।

यह मुझे 70 के दशक की अमेरिका का याद दिलाता है।” गौरतलब है कि ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ को प्रतिष्ठित कान्स अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में दिखाया गया था। फेवरेओ ने मीडिया से कहा, “मैंने ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ देखने से पहले सोचा था कि यह भी गाने और नृत्य से भरपूर बॉलीवुड फिल्म होगी। जैसा कि हिन्दी फिल्मों के बारे में अमेरिकियों की सोच होती है। लेकिन इस फिल्म ने हिन्दी फिल्मों के बारे में मेरी सोच को बदल कर रख दिया।” फेवरेओ कहते हैं कि ‘मसान’, ‘तितली’, ‘जुबान’ और ‘अलीगढ़’ जैसी फिल्में इस नई लहर का हिस्सा हैं। इन फिल्मों को न सिर्फ विदेश बल्कि अपने देश में भी काफी प्रशंसा मिली है। फेवरेओ की नई फिल्म डिज्नी की ‘द जंगल बुक’ भारत में 8 अप्रैल को रिलीज हो रही है। यह फिल्म अमेरिका में इसके एक हफ्ते बाद रिलीज होगी।

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