न्यूज़ जर्नलिस्ट अंकित कुमार गोयल से फिल्म निर्माता, निर्देशक एवं संगीतकार राहुल हरित की विशेष बातचीत
न्यूज़ जर्नलिस्ट अंकित कुमार गोयल
नई दिल्ली। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर जहां इन दिनों क्राइम, हिंसा, हॉरर और डार्क कंटेंट का बोलबाला है, वहीं फिल्म निर्माता एवं निर्देशक राहुल हरित अपनी नई पारिवारिक कॉमेडी फिल्म ‘तू कौन मैं खामखा’ के माध्यम से साफ-सुथरे और पूरे परिवार के साथ बैठकर देखे जाने वाले सिनेमा को फिर से स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। यह फिल्म वर्तमान में विभिन्न ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दर्शकों के लिए उपलब्ध है। फिल्म के निर्माता एवं निर्देशक राहुल हरित हैं, जबकि सह-निर्माता रंजना टंडन, प्रीयतोष वली और सुनीता हरित हैं। फिल्म का संगीत एवं संपादन भी राहुल हरित ने किया है। यही नहीं, उन्होंने फिल्म का ‘किचन सॉन्ग’ भी स्वयं गाया है। लंबे समय से थिएटर, टेलीविजन, डबिंग और फिल्म निर्माण से जुड़े राहुल हरित का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि परिवारों को एक बार फिर एक साथ बैठकर फिल्म देखने का अवसर देना है।
आज ओटीटी पर क्राइम और डार्क कंटेंट का दौर है। ऐसे समय में आपने पारिवारिक कॉमेडी फिल्म बनाने का निर्णय क्यों लिया?
आज जब भी कोई ओटीटी प्लेटफॉर्म खोलता है तो अधिकतर कंटेंट में क्राइम, हिंसा, हॉरर या अभद्र भाषा दिखाई देती है। ऐसे कंटेंट को पूरा परिवार एक साथ बैठकर नहीं देख सकता। मुझे लगा कि आज सबसे बड़ी कमी ऐसी फिल्मों की है जिन्हें माता-पिता, बच्चे और बुजुर्ग एक साथ बैठकर बिना किसी असहजता के देख सकें। इसलिए मैंने ‘तू कौन मैं खामखा’ जैसी साफ-सुथरी पारिवारिक कॉमेडी बनाने का निर्णय लिया। मेरा उद्देश्य दर्शकों को जबरदस्ती हंसाना नहीं था, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी की छोटी-छोटी परिस्थितियों को पर्दे पर उतारना था, जिनसे हर परिवार खुद को जोड़ सके।
फिल्म की कहानी रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी दिखाई देती है। इसके पीछे आपकी सोच क्या रही?
हमारी जिंदगी की सबसे साधारण बातें ही सबसे ज्यादा वास्तविक होती हैं। जैसे घर में पत्नी का यह पूछना कि “आज खाने में क्या बनेगा?” यह केवल एक संवाद नहीं बल्कि लगभग हर भारतीय परिवार की दिनचर्या का हिस्सा है। मैंने इन्हीं वास्तविक परिस्थितियों को कहानी का आधार बनाया। जब दर्शक स्क्रीन पर खुद को देखते हैं तो वे स्वाभाविक रूप से मुस्कुराते हैं। यही सच्ची कॉमेडी है। फिल्म में किसी प्रकार की फूहड़ता या जबरन हास्य पैदा करने का प्रयास नहीं किया गया है।
फिल्म में पुरुषों और महिलाओं की समान भागीदारी का संदेश भी दिखाई देता है। क्या यह जानबूझकर रखा गया?
बिल्कुल। मेरा मानना है कि घर केवल महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं है। यदि महिलाएं नौकरी कर सकती हैं तो पुरुष भी रसोई में हाथ बंटा सकते हैं। खाना बनाना केवल महिलाओं का काम नहीं होना चाहिए। परिवार तभी मजबूत बनता है जब सभी सदस्य एक-दूसरे की जिम्मेदारियां साझा करें। फिल्म में हमने इसी सोच को हल्के-फुल्के अंदाज में प्रस्तुत किया है ताकि संदेश भी पहुंचे और मनोरंजन भी बना रहे।
आपने इस फिल्म में नए कलाकारों को अवसर दिया। इसकी क्या वजह रही?
मेरा हमेशा से मानना रहा है कि नए कलाकारों में सीखने की ललक और स्वाभाविक अभिनय देखने को मिलता है। ओटीटी ने नए चेहरों को दर्शकों तक पहुंचने का अवसर दिया है। आज दर्शक केवल बड़े सितारों के पीछे नहीं भागते, बल्कि अच्छी कहानी और प्रभावशाली अभिनय को भी महत्व देते हैं। नए कलाकारों के साथ काम करने से कहानी अधिक वास्तविक लगती है और दर्शक उससे भावनात्मक रूप से जुड़ पाते हैं।
नए फिल्मकारों और युवाओं के लिए आपका क्या संदेश है?
उत्तर: मैं हर नए फिल्मकार से यही कहना चाहता हूं कि अपने कंटेंट के प्रति पूरी ईमानदारी रखें। शुरुआत में संघर्ष जरूर होगा और हर किसी को आसानी से आर्थिक सहयोग नहीं मिलता। लेकिन यदि आपकी कहानी मजबूत है और आपका काम ईमानदार है, तो रास्ते धीरे-धीरे बनते जाते हैं। आलोचना से डरने के बजाय उससे सीखना चाहिए। मेरा हमेशा से मानना रहा है कि ‘कंटेंट ही किंग है।’ यदि कंटेंट अच्छा होगा तो दर्शक उसे जरूर स्वीकार करेंगे।
न्यूज़ जर्नलिस्ट: अंकित कुमार गोयल







