Entertainment

विभाजन की त्रासदी को नफ़रत नहीं, इंसानियत के नज़रिए से समझने की ज़रूरत है: नवीन भास्कर

’81 माइल्स’ के लेखक, अभिनेता एवं रंगकर्मी नवीन भास्कर से न्यूज़ जर्नलिस्ट अंकित कुमार गोयल की विशेष बातचीत

अंकित कुमार गोयल

नई दिल्ली। भारत विभाजन केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की पीड़ा, संघर्ष और विस्थापन की ऐसी गाथा है, जिसकी स्मृतियाँ आज भी अनेक परिवारों की पीढ़ियों में जीवित हैं। इसी मानवीय संवेदना को केंद्र में रखकर लेखक, अभिनेता और रंगकर्मी नवीन भास्कर ने अपने चर्चित उपन्यास एवं एकल नाटक ’81 माइल्स’ की रचना की है। यह कृति केवल विभाजन की त्रासदी का वर्णन नहीं करती, बल्कि उन मानवीय मूल्यों को भी सामने लाती है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी इंसानियत को जीवित रखा।
करीब तीन दशकों से थिएटर, टेलीविजन, फिल्मों और वेब सीरीज से जुड़े नवीन भास्कर ने अपने अभिनय और लेखन के माध्यम से समाज और इतिहास से जुड़े विषयों को नई दृष्टि दी है। वर्ष 1992 में थिएटर से अपने करियर की शुरुआत करने वाले नवीन भास्कर ने दूरदर्शन के धारावाहिकों, फिल्मों और वेब सीरीज में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई हैं।
AajKiKhabar.com के लिए न्यूज़ जर्नलिस्ट अंकित कुमार गोयल ने नवीन भास्कर से उनके साहित्य, रंगमंच, अभिनय, उपन्यास ’81 माइल्स’, भारत विभाजन की स्मृतियों और आज के युवाओं के लिए इतिहास के महत्व पर विस्तार से विशेष बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस विशेष साक्षात्कार के प्रमुख अंश।

आपके अभिनय और लेखन का सफर कैसे शुरू हुआ? परिवार का कितना सहयोग मिला?

मेरे अभिनय की शुरुआत वर्ष 1992 में थिएटर से हुई। इसके बाद श्रीराम सेंटर से रंगमंच का प्रशिक्षण लिया और दिल्ली में दूरदर्शन के कई धारावाहिकों में अभिनय किया। वर्ष 2000 में मुंबई चला गया, जहाँ फिल्मों, टेलीविजन और वेब सीरीज में लगातार काम करने का अवसर मिला। मेरे परिवार का हमेशा पूरा सहयोग रहा। माता-पिता को सिनेमा और कला से विशेष लगाव था, इसलिए उन्होंने कभी मेरे रास्ते में बाधा नहीं बनने दी। आज भी मैं मानता हूँ कि कलाकार की सफलता के पीछे परिवार का विश्वास सबसे बड़ी शक्ति होता है।

’81 माइल्स’ लिखने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?

यह केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि मेरे परिवार की पीढ़ियों से चली आ रही स्मृतियों का दस्तावेज़ है। विभाजन के समय मेरे दादा-दादी, पिता, बुआ और परिवार के अन्य सदस्यों ने जो कठिनाइयाँ झेली थीं, उनकी कहानियाँ मैं बचपन से सुनता आया हूँ। वर्षों तक मैंने उन अनुभवों को संजोया, शोध किया और वास्तविक घटनाओं को ऐतिहासिक तथ्यों के साथ जोड़कर ’81 माइल्स’ का स्वरूप दिया। इस पुस्तक में केवल मेरा दृष्टिकोण नहीं, बल्कि उन हजारों परिवारों की पीड़ा भी शामिल है जिन्होंने विभाजन का दर्द सहा।

’81 माइल्स’ शीर्षक का क्या महत्व है?

उस समय लोग दूरी किलोमीटर में नहीं, बल्कि मील में नापते थे। मेरे परिवार और गाँव के लोगों ने पाकिस्तान से भारत की ओर आते हुए लगभग 81 मील की कठिन पैदल यात्रा तय की थी। यह शीर्षक केवल दूरी का प्रतीक नहीं है, बल्कि संघर्ष, साहस, विस्थापन और जीवित रहने की अदम्य इच्छा का प्रतीक है। इसी यात्रा ने इस कृति को उसका नाम दिया।

आपने इस कहानी को धार्मिक या राजनीतिक रंग देने से बचने की बात कही है। इसके पीछे क्या सोच रही?

मेरा उद्देश्य किसी धर्म या समुदाय को कटघरे में खड़ा करना नहीं था। विभाजन निश्चित रूप से इतिहास की दुखद घटना थी, लेकिन उस दौर में अनेक मुस्लिम परिवारों ने हिंदू और सिख परिवारों की जान बचाई। मैंने उन वास्तविक घटनाओं और पात्रों को भी स्थान दिया है ताकि आने वाली पीढ़ियाँ समझ सकें कि कठिन समय में इंसानियत सबसे बड़ा धर्म होती है। मेरा विश्वास है कि इतिहास से सीख लेकर समाज में सद्भाव और भाईचारे का संदेश देना अधिक आवश्यक है, न कि नफ़रत को बढ़ावा देना।

मंचन के दौरान ऐसा कौन-सा दृश्य था, जिसने आपको सबसे अधिक भावुक कर दिया?

इस नाटक में एक भाई और बहन के बीच का भावनात्मक प्रसंग मेरे लिए सबसे कठिन और सबसे संवेदनशील रहा। अब तक इस नाटक के चार मंचन हो चुके हैं—तीन मुंबई में और एक दिल्ली में। हर बार जब यह दृश्य मंच पर आया, मैं स्वयं भी भावुक हो गया और दर्शकों की आँखें भी नम हो गईं। मेरे लिए वही दृश्य इस पूरी प्रस्तुति की आत्मा है, क्योंकि उसमें विभाजन का दर्द, बिछड़ने की पीड़ा और रिश्तों की गहराई एक साथ दिखाई देती है।

आप इस उपन्यास के लेखक भी हैं और एकल नाटक में अभिनेता भी। लेखक और अभिनेता होने का यह अनुभव कितना अलग रहा?

जब कोई लेखक अपनी ही कहानी को मंच पर प्रस्तुत करता है, तो उसके मन में हर दृश्य पहले से जीवंत होता है। आज दक्षिण भारतीय सिनेमा में भी लेखक को निर्देशन का अवसर इसलिए दिया जाता है क्योंकि वही अपनी कहानी की आत्मा को सबसे बेहतर समझता है। मैंने वर्षों तक थिएटर किया है, इसलिए जब इस कहानी को लिखा तो उसके दृश्य स्वतः मेरे सामने बनते चले गए। मंचन के माध्यम से मैंने पहले दर्शकों की प्रतिक्रिया जाननी चाही और रंगमंच से जो प्रेम और सराहना मिली, उसने मेरे विश्वास को और मजबूत किया।

 

विभाजन पर पहले भी कई पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। आज के युवाओं को ’81 माइल्स’ क्यों पढ़नी चाहिए?

आज के समय में समाज को जोड़ने वाली कहानियों की सबसे अधिक आवश्यकता है। विभाजन निश्चित रूप से धर्म के आधार पर हुआ, लेकिन उसके पीछे राजनीतिक परिस्थितियाँ भी थीं। इस उपन्यास का उद्देश्य किसी धर्म या समुदाय के प्रति कटुता पैदा करना नहीं, बल्कि यह बताना है कि कठिन परिस्थितियों में भी इंसानियत जीवित रही। इसमें ऐसे वास्तविक प्रसंग हैं जहाँ मुस्लिम परिवारों ने हिंदू और सिख परिवारों की रक्षा की। नई पीढ़ी इस पुस्तक के माध्यम से इतिहास को केवल संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के रूप में भी समझ सकेगी।

नाटक के संगीत और अभिनय के तालमेल ने दर्शकों को भावुक किया। इसके पीछे क्या सोच रही?

इस नाटक के दोनों गीत मैंने स्वयं लिखे हैं। संगीतकार प्रदीप पांडे से जब मैंने कहानी और उसके भाव साझा किए, तो उन्होंने उसी भावना के अनुरूप संगीत तैयार किया। रंगमंच पर संगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होता, बल्कि वह पात्रों की भावनाओं को दर्शकों तक पहुँचाने का कार्य करता है। सही समय पर आने वाला संगीत दर्शकों को कहानी से और गहराई से जोड़ देता है।

क्या भविष्य में ’81 माइल्स’ पर फिल्म या वेब सीरीज बनाने की योजना है?

बिल्कुल। मेरी इच्छा है कि ’81 माइल्स’ पर एक भव्य फिल्म बने और इसके लिए कई प्रतिष्ठित संस्थाओं के साथ बातचीत भी चल रही है। लेकिन मेरी एक ही शर्त है कि इस कहानी को किसी भी प्रकार का राजनीतिक रंग न दिया जाए। मैं चाहता हूँ कि इसकी मूल भावना, संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण पूरी तरह सुरक्षित रहें। यदि कभी इसका फिल्मी रूपांतरण होता है तो उसकी आत्मा से कोई समझौता नहीं होना चाहिए।

क्या आप इस कृति को देशभर के स्कूलों, कॉलेजों और थिएटर महोत्सवों तक ले जाने की योजना बना रहे हैं?

हाँ, मेरी पूरी कोशिश है कि ’81 माइल्स’ अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचे। इस दिशा में कई प्रमुख संस्थानों से बातचीत चल रही है। हाल ही में मुझे नोएडा स्थित एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन के मंच पर इसे प्रस्तुत करने का अवसर मिला। मेरा मानना है कि यदि युवा पीढ़ी इस कहानी को पढ़े और मंच पर देखे, तो वह इतिहास को केवल किताबों में नहीं बल्कि संवेदनाओं के साथ समझ पाएगी।

आज के युवाओं और अभिनय की दुनिया में आने वाले कलाकारों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?

अभिनय केवल संवाद बोलने का नाम नहीं है। एक अच्छा अभिनेता बनने के लिए साहित्य पढ़ना, समाज को समझना और लगातार सीखते रहना बहुत आवश्यक है। हमारे थिएटर प्रशिक्षण में हमें बताया जाता था कि ACTOR शब्द अपने आप में अभिनय का मंत्र है—A अर्थात Action, C अर्थात Concentration, T अर्थात Timing, O अर्थात Observation और R अर्थात Reaction। यदि कोई कलाकार इन पाँच गुणों को अपने भीतर विकसित कर ले, तो वह अभिनय की हर चुनौती का सामना कर सकता है।

आपने इतने बड़े विषय पर एकल नाटक करने का निर्णय क्यों लिया?

इतने बड़े विषय को बड़े स्तर पर मंचित करना आर्थिक दृष्टि से आसान नहीं होता। हिंदी रंगमंच को आज भी पर्याप्त संसाधन और आर्थिक सहयोग नहीं मिल पाता। इसलिए मैंने एकल नाटक का प्रारूप चुना। दर्शकों से जो प्रतिक्रिया मिली, उसने यह विश्वास दिलाया कि यदि कहानी सशक्त हो और कलाकार पूरी ईमानदारी से उसे जीए, तो सीमित संसाधनों में भी प्रभावशाली प्रस्तुति दी जा सकती है। मैं जब मंच पर अलग-अलग पात्रों को निभाता हूँ, तो उन्हें केवल अभिनय नहीं करता, बल्कि उनके भीतर जीने का प्रयास करता हूँ। यही कारण है कि दर्शक उन पात्रों से भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं।

’81 माइल्स’ को लिखने और तैयार करने में कितना समय लगा?

यदि केवल लेखन की बात करें तो यह एक उपन्यास है, लेकिन इसकी वास्तविक यात्रा बचपन से शुरू हुई। लगभग 30 से 40 वर्षों तक मैंने अपने परिवार के बुज़ुर्गों से विभाजन की घटनाएँ सुनीं, उन्हें संजोया और उन पर लगातार शोध किया। इस पुस्तक में अनेक वास्तविक अनुभवों को कहानी के साथ जोड़ा गया है। इसलिए यह केवल कल्पना पर आधारित रचना नहीं, बल्कि लंबे शोध, पारिवारिक स्मृतियों और ऐतिहासिक तथ्यों का परिणाम है।

न्यूज़ जर्नलिस्ट: अंकित कुमार गोयल

BRIJESH SINGH
the authorBRIJESH SINGH