मनीष खेमका
चेयरमैन, ग्लोबल टैक्सपेयर्स ट्रस्ट एवं सदस्य जीएसटी ग्रीवांस रिड्रेसल कमेटी उत्तर प्रदेश
ज़ी टीवी और एस्सेल ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा का ₹22,000 करोड़ का कर्ज सिर्फ ₹6.5 करोड़ में माफ़ कर दिया गया। पिछले दिनों प्रकाशित यह खबर वाक़ई सनसनीख़ेज़ थी। आंकड़े इतने बड़े और आश्चर्यजनक थे जिसने सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया। क्या भारत का कानून इतना कमजोर है? क्या एक संवैधानिक संस्था इतनी बड़ी चूक कर सकती है? सोशल मीडिया पर इसे लेकर मज़ाक़बाजी और लानत मलामत का दौर भी स्वाभाविक था। रोज़मर्रा की परेशानियों से जूझते आम आदमी ने अपनी कुंठा, ईर्ष्या, हताशा से राहत पाने को ख़ूब कमेंट किए। सब मिले हुए हैं… काश मैं भी इतना बड़ा लोन ले लेता…। हालाँकि नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) के 144 पन्नों का ताज़ा आदेश और अनेक तथ्य कुछ और ही कहानी कहते हैं। सुभाष चंद्रा ने भी इस मीडिया ट्रायल को चुनौती देते हुए अपने पहले वीडियो मैसेज में वित्त मंत्री से पूरे मामले की जांच एक स्वतंत्र ऑडिटर से करवाने की माँग की जिससे सच सब के सामने आ सके। इसके साथ ही 29 अगस्त की रात करीब साढ़े दस बजे सुभाष चंद्रा ने अपने फ़ेसबुक पेज पर एक और वीडियो पोस्ट किया। जिसमें उन्होंने लिखा “आपके सवाल हैं, तो जवाब भी मुझसे ही होने चाहिए। मैं सही हूँ या गलत, ये फैसला भी सीधी बातचीत के बाद ही हो। आप सवाल पूछिए। मैं जवाब दूँगा। कोई बीच में नहीं। बस आप और मैं” स्वाभाविक रूप से कोई व्यक्ति कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, वह क़ानून से बड़ा नहीं हो सकता। यदि उसने कोई ग़ैर कानूनी काम किया हो, पैसों की हेराफेरी, ठगी या धोखाधड़ी की हो तो सख़्त सज़ा मिलनी चाहिए। लेकिन कारोबार में नुकसान हो गया तो करवाई तय क़ानूनों के मुताबिक़ की जानी चाहिए। वास्तविक तथ्यों के आधार पर पूरे मामले को समझने पर कई सच सामने आते हैं।
पहला सच: चंद्रा व्यक्तिगत कर्जदार नहीं
22,000 करोड़ की इस रकम में सुभाष चंद्रा ने एक रुपया भी निजी लोन नहीं लिया है। यह वह राशि है जो उनके ऐस्सेल समूह की कंपनियों, जैसे विवेक इन्फ़्राकॉन आदि ने उधार लिया था और चंद्रा ने इसके लिए व्यक्तिगत गारंटी दी थी। आईबीसी के कानून और सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले के मुताबिक़ मुख्य कर्जदार और व्यक्तिगत गारंटर दो अलग इकाई हैं। एक की इन्सॉल्वेंसी से दूसरे का कर्ज माफ नहीं होता। इसलिए बैंकों का उन कंपनियों से पैसा वसूलने का अधिकार आज भी सुरक्षित है। भले ही उन्हें चंद्रा की व्यक्तिगत जेब से पैसा नहीं मिला।
दूसरा सच: ₹22,000 करोड़ नहीं, असली दावा ₹3,992 करोड़
एनसीएलटी के सामने 2022 में जो शुरुआती दावे आए, उन्हें जोड़कर ₹22,006 करोड़ बताया गया। चंद्रा के अनुसार आज की तारीख में उन पर व्यक्तिगत गारंटी का दावा मात्र ₹3,992 करोड़ है, जिसमें से ₹620 करोड़ पहले ही सेटल हो चुका है और ₹1,063 करोड़ उधार लेने वाली कंपनियों ने चुकाने का प्रस्ताव दिया है। मीडिया ने 2022 के पुराने आंकड़े को आज का बकाया बताकर सनसनी फैलाई।
तीसरा सच: 80.81% लेनदार हैं सहमत
यह किसी अकेले जज का एकतरफ़ा या मनमाना फैसला नहीं है। एनसीएलटी के आदेश के पेज 17 पर वोटिंग रिकॉर्ड साफ है। प्रस्ताव को 80.814% लेनदारों से मंजूरी मिली। इसमें कैटलिस्ट ट्रस्टीशिप (11.85%), वर्ल्ड क्रेस्ट एडवाइजर (28.49%), लेमोनेड कैपिटल (16.85%), कॉर्पकॉल कैपिटल (10.30%), वीना इन्वेस्टमेंट्स (4.99%) और खुद याचिकाकर्ता इंडियाबुल्स हाउसिंग (1.98%) शामिल हैं।
विरोध में केवल 19.186% वोट हैं – एलआईसी हाउसिंग (6.09%), एचडीएफ़सी बैंक (3.17%), ऐक्सिस (2.86%), कैनरा(1.60%), आईडीबीआई ट्रस्टीशिप (3.36%), आरएलबी (0.55%) आदि। आईबीसी की धारा 114 कहती है कि 50% से ज्यादा वोट मिलने पर ट्रिब्यूनल को योजना को मंजूरी देनी होगी। जस्टिस नीलेश शर्मा ने बिल्कुल सही लिखा है कि ट्रिब्यूनल का काम लेनदारों के व्यावसायिक विवेक को बदलना नहीं है। कहते हैं, जब मियाँ बीबी राजी तो क्या करेगा काजी? जब 80% लेनदार इस फैसले से सहमत हैं तो इसमें घपले-घोटाले की बात कहाँ से आ गई?
चौथा सच: लेनदारों से साठगांठ का आरोप अदालत में नहीं टिका
विरोधी बैंकों ने कहा कि वीना इन्वेस्टमेंट्स और वर्ल्ड क्रेस्ट जैसी कंपनियां चंद्रा की रिश्तेदार हैं। अतः उन्हें वोटिंग में शामिल नहीं करना चाहिए। जबकि तथ्य यह है की उधार उन्होंने भी दिया। फिर उन्हें शामिल क्यों न किया जाए? एनसीएलटी ने कानूनी व्याख्या करते हुए कहा कि एसोसिएट वही है जिसमें देनदार का 50% से ज्यादा शेयर या बोर्ड कंट्रोल हो। सिर्फ शक या पारिवारिक संबंध के आधार पर वोटिंग अधिकार नहीं छीना जा सकता। एक बार यदि हम सभी सहमत लेनदारों को सुभाष चंद्रा का मित्र या रिश्तेदार मान भी लें तो इसका क्या मतलब है? माने सुभाष चंद्रा ने 80% उधार अपने रिश्तेदार से लिया और ज़्यादातर पैसा उनके अपनों का ही डूबा। यह बात और भी अधिक हास्यास्पद लगती है।
पांचवां सच: ₹43,000 करोड़ लौटाने वाला भगोड़ा कैसे?
जनवरी 2019 में जब ऐस्सेल समूह पर संकट आया, कुल कर्ज लगभग ₹45,000 करोड़ था। चंद्रा के अनुसार समूह ने अपनी संपत्तियां, ज़ी टीवी के शेयर बेचकर अब तक ₹43,000 करोड़ बैंकों को लौटा दिया है। जो व्यक्ति 91% कर्ज चुका दे, उसे चोर कहना कहां का न्याय है? वास्तविक यह है की सब कुछ बेचने के बाद आज समूह की कंपनी फ़्लैगशिप कंपनी ज़ी एंटरटेनमेंट में प्रमोटर का हिस्सा मात्र 4% ही बचा है। सुभाष चंद्रा जैसे उद्यमी जिसने देश को पहला प्राइवेट सैटेलाइट चैनल दिया, 8000 परिवारों को रोजगार दिया, देश की अर्थव्यवस्था में करीब 70,000 करोड़ का योगदान दिया अगर वह संकट में ईमानदारी से 43 हजार करोड़ लौटाता है, देश में रह कर मुक़दमों का सामना करता है, सबको जवाब देता है, तो हमें उसका मीडिया ट्रायल करने के बजाय कानून को समझना चाहिए।
रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल शिव नंदन शर्मा की रिपोर्ट, जो एनसीएलटी आदेश का आधार है, में साफ लिखा है – “चंद्रा ने संपत्ति छुपाई नहीं है, कोई गुप्त संपत्ति नहीं बनाई, सामान्य जीवन जी रहे हैं। दिवालियापन में उनकी संपत्ति बिकने पर प्रक्रिया का खर्च भी नहीं निकलेगा।” इसलिए ₹6.25 करोड़ लेना, शून्य से बेहतर है। चंद्रा ने यह भी कहा है कि उनके पास अब केवल एक छोटा सा मकान है जिसका एक हिस्सा किराए पर देकर वे खर्च चला रहे हैं और बचे हुए ₹6.5 करोड़ भी वे चुकाने को तैयार हैं। एनसीएलटी का आदेश लूट नहीं, बल्कि आईबीसी- दीवालिया प्रक्रिया कानून की मूल भावना – “जितना है, उतना वसूलो और उद्यमी को दूसरा मौका दो” – का पालन है।
छठा सचः सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत हैसियत पर ग़लत बयानबाज़ी
मीडिया रिपोर्टों में बताया गया कि साल 2017 में सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत हैसियत 45000 करोड़ रुपए थी। जबकि 2016 में सुभाष चंद्रा जब राज्यसभा से संसद चुने गए तब उन्होंने अपनी कुल सम्पत्ति 39 करोड़ रुपए घोषित की थी। हर सांसद को नियमानुसार यह जानकारी देनी पड़ती है।
चवन्नी की चोरी पर शोर, लाखों करोड़ की लूट इग्नोर
आज हम सुभाष चंद्रा के मामले की चर्चा कर रहे हैं।भारत का सबसे बड़ा कोयला घोटाला 1.86 लाख करोड़ का माना जाता है। 2G स्पेक्ट्रम घोटाला 1.76 करोड़, विजय माल्या 9000 करोड़, नीरव मोदी 11400 करोड़ और बोफ़ोर्स घोटाला सिर्फ़ 64 करोड़। सबसे मज़े की बात तो यह कि घोटाले की यह सारी रक़म अनुमान भर हैं। दावा हैं, वास्तविकता नहीं। जबकि आज की तारीख़ में चुनावी मुफ़्तख़ोरी भारत का सबसे बड़ा घोटाला है। इस हमाम में भारत के सभी राजनीतिक दल शामिल हैं। पूरे देश और प्रदेशों में मुफ्त साड़ी, साइकिल, लैपटॉप, सोने के गहने, राशन, बिजली और तमाम भत्तों जैसी राजनीतिक मुफ़्तख़ोरी पर कई लाख करोड़ रुपयों की रक़म खर्च होती है। जिन्हें भी यह मुफ़्तख़ोरी जायज़ लगती है उन्हें पहले यह बताना चाहिए की इसके लिए पैसे कहाँ से आएंगे ? हम भारतीय चवन्नी के घोटालों की ख़ूब चर्चा करते हैं। राजनीतिक लाभ के लिए हमारी जेबों से लाखों करोड़ रुपये दिन दहाड़े लूटे जा रहे हैं उस पर बात ही नहीं होती।
गंभीर विमर्श: कानून का पालन ज़रूरी। लूट की छूट नहीं। देश के विकास के लिए करदाताओं-कारोबारियों को प्रोत्साहन भी ज़रूरी
सुभाष चंद्र के इस चर्चित मामले के बहाने देश में एक निष्पक्ष और स्वस्थ बहस होनी चाहिए। उन्होंने या उनके समूह ने यदि किसी कानून उल्लंघन किया है तो सजा मिलनी चाहिए। उधार देना भी एक कारोबार है। हर व्यापार की तरह इसमें भी जबरदस्त फायदे या नुकसान की पूरी संभावना होती है। हर व्यापार के लिए हमारे देश में तय कानून हैं। यदि हमें कानून कमज़ोर लगता है या उसमें बदलाव की आवश्यकता है तो यह होना चाहिए। लेकिन क़ानून लोगों के लिए बनते हैं। लोग क़ानून के लिए नहीं बने। यह स्वाभाविक बात हम सभी को समझनी चाहिए। आम जनता हो या करदाता यह बात सभी पर लागू होती है। हम सभी अपने व्यवहार व कारोबार में कानूनों और नैतिक तौर तरीक़ों का पालन करें यह जरूरी है। लेकिन करदाता कारोबारियों का अस्तित्व बचाए रखने के लिए व ग़रीबी-बेरोज़गारी उन्मूलन जैसे देश के व्यापक हित में जहाँ जरूरी हो तर्कसंगत सुधार व क़ानूनी प्रक्रियाओं में व्यवहारिक उदारता भी आवश्यक है। क्या कोई भी कारोबार मुनाफ़े की गारंटी होता है? करदाता व कारोबारी छोटे हों या बडे वास्तव में देश के आर्थिक नेता होते हैं। जो तमाम क़ानूनी बंदिशों, अड़चनों के बावजूद अपनी मेहनत और लागत के आधार पर बडा रिस्क लेते हैं। जिससे हज़ारों, लाखों परिवार चलते हैं। उन्हें लाभ हो, न हो, सरकार को डायरेक्ट-इनडायरेक्ट टैक्स तो मिलता ही है। जिससे देश चलता है। अपनी मेहनत और पूँजी पर रिस्क ले कर देश के विकास में योगदान करने वाले व्यक्ति निश्चित ही सराहना और सम्मान के पात्र हैं। जैसे रणभूमि में जान देने वाले सैनिकों को हम सज़ा नहीं बल्कि श्रद्धा का पात्र मानते हैं, समाज का वही भाव करदाता व कारोबारियों के प्रति भी होना चाहिए। भले ही वे असफल क्यों न हो जाएँ। हमें यह बात ज़रूर ध्यान में रखनी चाहिए।




