
(न्यूज़ जर्नलिस्ट अंकित कुमार गोयल)
सवाल
सबसे पहले तो आज आपका बहुत-बहुत आभार और धन्यवाद कि आपने समय निकाला। नोएडा के डॉ. महिपाल सिंह पिछले 10 साल से एक ही जंग लड़ रहे हैं – दर्द को दवा नहीं, मूवमेंट से हराओ। सेरेब्रल पाल्सी वाले बच्चे को पहली बार चलना सिखाने से लेकर आईटी प्रोफेशनल्स की टूटी कमर सीधी करने तक, यह हर मरीज की बॉडी के पर्सनल इंजीनियर बन जाते हैं। आपका फंडा क्लियर है – कुर्सी गलत है, तो जिंदगी भर फिजियोथेरेपी करवाओगे। हजारों मरीजों की दुआओं के साथ आपका एक ही मिशन है – मूव बेटर, लिव बेटर।
डॉ. महिपाल जी, “दर्द को दवा नहीं, मूवमेंट से हराओ” यह फिलॉसफी आपको कहां से मिली? क्या कोई मरीज था जिसने आपकी सोच बदल दी?

जवाब
सबसे पहले मैं बताना चाहूंगा कि 10 साल नहीं, बल्कि मुझे इस फील्ड में काम करते हुए 17 साल हो गए हैं। मैं फिजियोथेरपिस्ट और एर्गोनॉमिस्ट हूं। विंसम रिहैब सेंटर और फर्स्ट वन रिहैब फाउंडेशन मेरी संस्थाएं हैं।
विंसम रिहैब सेंटर में मैं फिजियोथेरेपी के मरीजों का इलाज करता हूं। साथ ही कंपनियों, विशेषकर आईटी सेक्टर में, वर्क स्टेशन मॉडिफिकेशन, पोस्टरल करेक्शन और कर्मचारियों के उपचार पर भी काम करता हूं।
फर्स्ट वन रिहैब फाउंडेशन मैंने उन बच्चों के लिए शुरू किया है, जिन्हें मैं पिछले 15 वर्षों से लगातार थेरेपी दे रहा हूं और जो सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित हैं।
सवाल
फर्स्ट वन रिहैब फाउंडेशन शुरू करने के पीछे आपकी क्या सोच थी?
जवाब
फर्स्ट वन रिहैब फाउंडेशन शुरू करने का मुख्य उद्देश्य एक ऐसी संस्था बनाना था, जहां आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को भी सम्मानपूर्वक और सही तरीके से थेरेपी मिल सके। इसी वजह से इसका नाम “फर्स्ट वन” रखा गया। यह ऐसा केंद्र है, जहां अंडरप्रिविलेज्ड बच्चे अपने माता-पिता के साथ आते हैं, क्योंकि इन बच्चों की थेरेपी में माता-पिता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है।
हमारा प्रयास है कि इन बच्चों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जाए और उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जाए।

सवाल
मतलब सबसे बड़ी बात आपने यह कही कि जिन बच्चों को आपने थेरेपी दी, आज वही यहां नौकरी के अवसर भी प्राप्त कर रहे हैं?
जवाब
जी हां, बिल्कुल। आज हमारी संस्था में वही बच्चे मैनेजर की भूमिका निभा रहे हैं। डिजिटल मीडिया मैनेजर का काम भी वही संभाल रहे हैं। अकाउंट्स की जिम्मेदारी भी उन्हीं के पास है। संस्था के प्रचार-प्रसार का काम भी वही बच्चे कर रहे हैं।
असल में, पांच साल पढ़कर डॉक्टर बनने से भी बड़ा अनुभव उस व्यक्ति के पास होता है, जिसने 15–17 वर्षों तक स्वयं उपचार की प्रक्रिया को जिया हो। जैसे आपने देखा होगा कि कई बार बड़े डॉक्टर के साथ काम करने वाला कंपाउंडर वर्षों के अनुभव के बाद खुद भी बहुत कुछ सीख जाता है। उसी प्रकार इन बच्चों ने थेरेपी को किताबों में नहीं, बल्कि अपने जीवन में अनुभव किया है।
इन्होंने थेरेपी को समझा है, थेरेपिस्ट की सोच को समझा है और उपचार की प्रक्रिया को करीब से महसूस किया है। इसलिए आज वे एक बेहतर सेंटर का संचालन करने में सक्षम हैं।
सवाल
अब जॉब के अवसर किस प्रकार तैयार किए जा रहे हैं?

जवाब
फर्स्ट वन की मुहिम के तहत हम अगले छह महीने से एक वर्ष के भीतर एक ऐसा सेंटर विकसित करना चाहते हैं, जो वर्कशॉप सेंटर और एक्टिविटी सेंटर के रूप में काम करे। वहां थेरेपी के साथ-साथ कुटीर उद्योगों को भी बढ़ावा दिया जाएगा। एमएसएमई और अन्य सरकारी योजनाओं के तहत छोटे स्तर के व्यवसायों को जोड़ा जाएगा। हमारी योजना यह है कि जब बच्चे थेरेपी लेने आएं, तो उनके माता-पिता खाली न बैठें। वे डिस्पोजेबल हैंडवॉश कोन, एलईडी बल्ब, चप्पल, पोछा और अन्य छोटे उत्पादों के निर्माण जैसे कार्यों से जुड़ सकें।
ये ऐसे कार्य हैं, जिन्हें घर पर रहकर भी किया जा सकता है।
सवाल
यानी आप इलाज के साथ-साथ परिवारों को आर्थिक रूप से भी मजबूत बनाना चाहते हैं?
जवाब
बिल्कुल। हमारा उद्देश्य यह नहीं है कि लोगों को लगे कि उन पर कोई एहसान किया जा रहा है।
हम चाहते हैं कि वे भी अपना श्रमदान दें और हम भी उनके बच्चों के भविष्य के लिए अपना योगदान दें। जब माता-पिता और बच्चे मिलकर कार्य करेंगे, तो उनकी आर्थिक स्थिति भी मजबूत होगी। जो लोग हमारी संस्था की मदद करना चाहते हैं, वे इन उत्पादों को खरीद सकते हैं। चाहे वे उन्हें स्वयं उपयोग करें, दूसरों में वितरित करें या बेचें – इससे इन परिवारों को आत्मनिर्भर बनने में सहायता मिलेगी।
सवाल
आप इस पूरे मॉडल को कितने समय में जमीन पर उतारना चाहते हैं?
जवाब
देखिए, पांच साल बहुत लंबा समय होता है। मैं इतना लंबा नहीं सोचता।
मेरा लक्ष्य है कि छह महीने से एक वर्ष के भीतर इस योजना को पूरी तरह लागू कर दिया जाए।
नोएडा में बहुत जल्द फर्स्ट वन रिहैब फाउंडेशन का यह मॉडल विकसित होता दिखाई देगा।

सवाल
डॉ. महिपाल जी, आप खुद को मरीज की बॉडी का पर्सनल इंजीनियर कहते हैं। एक इंजीनियर की तरह बॉडी को ठीक करते समय पहला कदम क्या होता है?
जवाब
अगर हम अपने पूर्वजों को देखें, तो वे छोटी-मोटी शारीरिक समस्याओं का समाधान स्वयं कर लिया करते थे। कोई गर्दन खींचने के लिए रस्सी का प्रयोग करता था, कोई योग करता था, तो कोई शरीर की अकड़न दूर करने के लिए घरेलू उपाय अपनाता था। धीरे-धीरे यही चीजें मूवमेंट और एक्टिविटी आधारित थेरेपी के रूप में विकसित हुईं। लेकिन मैं केवल शरीर को नहीं देखता। जब मुझे स्वयं दर्द होता है, तो मैं समझ पाता हूं कि दर्द के साथ शरीर में क्या-क्या बदलाव आते हैं। आपकी कौन-सी मांसपेशियां अकड़ रही हैं, कौन-सा मूवमेंट प्रभावी है, आपको खाने का मन हो रहा है या नहीं, किसी से बात करने का मन कर रहा है या नहीं – यह सब दर्द का हिस्सा होता है। दर्द केवल शरीर में नहीं होता, बल्कि उसके साथ तनाव, चिड़चिड़ापन, गुस्सा और मानसिक दबाव भी आता है।इसलिए मरीज केवल दर्द लेकर नहीं आता, वह अपनी भावनात्मक परेशानियां भी साथ लेकर आता है।ऐसे समय में उससे टकराने की बजाय, प्यार और धैर्य के साथ उसका उपचार करना चाहिए।क्योंकि आपको केवल उसकी शारीरिक स्थिति ही नहीं, बल्कि उसकी मानसिक स्थिति को भी बेहतर बनाना होता है।
जब आपकी सोच इस प्रकार की होती है, तो मरीज अपेक्षाकृत जल्दी स्वस्थ होता है।

अगले भाग में पढ़िए
सेरेब्रल पाल्सी वाले बच्चों को पहली बार चलते हुए देखने का अनुभव
आईटी प्रोफेशनल्स की कमर दर्द का असली कारण
गलत पोश्चर और आधुनिक जीवनशैली की चुनौतियां
फिजियोथेरेपी में हाथों की ताकत और अनुभव की भूमिका




