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न्यूज़ जर्नलिस्ट अंकित कुमार गोयल के साथ कवि, राजनेता और शिक्षाविद डॉ मनोज कुमार यादव का एक्सक्लुसिव इंटरव्यू

आपने अपने करियर की शुरुआत कैसे की और परिवार का कितना सहयोग मिला?

धन्यवाद अंकित जी मेरे कैरियर की शुरुआत ही मेरे परिवार से हुई। पिताजी को कवि सम्मेलन में जाकर कवियों को सुनना बहुत पसंद था। जब भी आसपास कहीं कवि सम्मेलन होता तो वे सुनने अवश्य जाते थे। कई बार तो आने में सुबह हो जाती थी। उन्हें अच्छी कविताओं को डायरी में लिखने का शौक था। एक दिन मैंने वो डायरी पढ़ी और फिर मेरे भीतर लिखने के भाव आने लगे। कक्षा 6 में था जब मैंने अपनी पहली कविता लिखी थी। उस समय दो रुपए की बिल्कुल पतली कॉपी आती थी। मैंने कई कविताएं उस कॉपी में लिखी। हिंदी शुरू से पर फेवरेट सब्जेक्ट रहा था सो मुझे कविताऐं लिखने में आनंद आने लगा। पिताजी ने इंजीनियरिंग में एडमिशन करा दिया तो वहां भी मन से पढ़ाई की और बीटेक की डिग्री हासिल की।

आपके अनुसार डॉ यादव जी, क्या आर्टिफिशल इंटेलिजेंट आने के बाद अवसर बढ़ेंगे या चुनौतीयाँ?

मुझे लगता है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हमें टेक्नोलॉजी दे सकता है, नेटवर्क बनाने में मदद कर सकता है लेकिन वो भावनाएं आपकी रचना में नहीं डाल सकता जो आप अपने आसपास के समाज को देखकर कागज़ पर उतारते हैं और जिनसे लोग आपकी रचना को पढ़ने के लिए प्रेरित होते हैं।

डॉ. यादव, आपकी कविताओं में सबसे अधिक क्या झलकता है – आपकी इंजीनियरिंग की पढ़ाई या आपका समाजवादी दृष्टिकोण?

कविताओं में मुझे लगता है कि समाजवाद की झलक अधिक दिखती है। जिस समाज से मैं आता हूं बचपन से वहां की समस्याओं और तकलीफों से वाकिफ हूं और कहीं न कहीं मेरी कलम भी उसी उत्पीड़न और कष्ट को पन्नों पर उतारने का काम करती है।

जब आप बेरोजगार थे, तब आपके दिमाग में क्या चल रहा था?

बड़ा ही कठिन समय था। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी सभी छह भाई बहन पढ़ाई कर रहे थे और कमाने वाले एकमात्र पिताजी।बीटेक करने के बाद घर में रहकर तैयारी करने का मन बनाया। यकीन मानिए बड़ा कष्टकारी समय था वो जब हर रिश्तेदार और पड़ोसी किसी न किसी बहाने से बेरोज़गारी पर तंज कस ही देता था। खामखां ही मुस्कुराना पड़ गया है, खुश हूं मैं सबको दिखाना पड़ गया है ये पंक्तियां मेरी उस समय कि मनोदशा को प्रदर्शित करती हैं।थक हार कर एक इंजीनियरिंग कॉलेज में लेक्चरर के लिए इंटरव्यू दिया और अध्यापन कार्य आरम्भ कर दिया।

दूसरा दौर बेरोजगारी का वो आया जब कोरोना के बाद संस्थान ने हाथ जोड़ लिए। सोचिए आप सत्तर अस्सी हजार रुपए महीने कमा रहे हो और अचानक से फर्श पर आ जाओ वो भी तब जब आपके परिवार, पत्नी और बच्चों की जिम्मेदारी आप पर हो। खैर मैंने किसी तरह एक इंटर कॉलेज ज्वाइन किया वहां फिजिक्स पढ़ाने लगा। घर घर जाकर ट्यूशन पढ़ाई। कमाल की बात देखिए मैं जिस कॉलेज में पढ़ा रहा था ढाई महीने पढ़ाने के बाद वहां के मालिक ने मुझे दो हजार रूपए सैलरी के रूप में दिए। उस दिन मेरी पत्नी की आंखों से आंसू आ गए और वो बोली इससे अच्छा है कि तुम घर बैठो। लेकिन मैंने कभी हिम्मत नहीं हारी हमेशा यही सोच मन में रखी ठोकरें खाना मेरी फितरत नहीं,आज गिरकर कर उठेंगे देखना ।खैर फिर एक इंजीनियरिंग कॉलेज में मुझे फिर से जॉब मिली और धीरे धीरे गाड़ी पटरी पर आ गई।

आपकी कविताएँ लोगों को क्या संदेश देती हैं?

मेरी अधिकांश कविताओं में साथ मिलकर खुशी से जीवन जीने का संदेश देती हैं। जाति पात और धर्म के नाम पर नफरत करने वालों को मैंने सदैव सही राह दिखाने का प्रयास किया है। नफरतों में कहां गुजर होती जिंदगी थी गुलाब में जिंदा एक ऐसी ही रचना है जो प्रेम से जीने का संदेश देती है।

आपने राजनीति में आने का फैसला क्यों किया?

एक तो जन्मस्थान इटावा रहा जो कि उत्तर प्रदेश की राजनीति की धुरी था और उस पर समाजवादी विचारधारा। गरीबों मजलूमों के लिए, सच के लिए लड़ने का गुण पैतृक था सो राजनीति में भी कूद गए। समाजवादी नौजवान सभा के राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर काफी समय तक काम किया।

आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है?

सबसे बड़ी उपलब्धि मेरे पाठकों और मेरे छात्रों का मेरे प्रति प्रेम है। जब लोग पास आकर अपने दुख तकलीफें इस उम्मीद के साथ शेयर करते हैं कि शायद उनकी समस्या का कुछ हल निकल पाए तो ये किसी भी व्यक्ति की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।

आपने अपने जीवन में सबसे अधिक किस व्यक्ति से प्रेरणा ली है?

मेरे पिताजी। बचपन से ही उन्हें संघर्ष करते देखा। अकेले छह बच्चों को अच्छी पढ़ाई के लिए नौकरी के बाद ट्यूशन, कोचिंग करते देखा,भैंस पालते देखा, साइकिल से तीस तीस किलोमीटर रिश्तेदारियां निभाने जाते देखा, चौपाल लगाकर लोगों के आपसी लड़ाई झगड़े निपटाते देखा। मेरे लिए मेरे जीवन के सबसे बड़े हीरो मेरे पिताजी रहे हैं और रहेंगे और ये मेरे लिए बहुत ही गर्व की बात है।

आपकी कविताओं में उत्तर प्रदेश की संस्कृति का कितना प्रभाव है?

काफी प्रभाव है। यहां का रहन सहन, बोली भाषा, लोगों की सोच बचपन से देखते आया हूं तो निश्चित रूप से कहीं न कहीं मेरी रचनाओं में वो भी परिलक्षित होती है।

कहानिकार बनने के लिए क्या पढ़ना और करना चाहिए आप व्यावहारिक समझा दीजिये?

मुझे लगता है अगर आप एक अच्छे कहानीकार बनना चाहते हैं तो अपने आसपास के लोगों को,उनकी तकलीफों को, उनकी खुशियों को देखना और उनमें शामिल होना सीखें। हमें अधिकांश कहानियां अपने आसपास ही मिलती हैं। दूसरी चीज है कि एक अच्छे कहानीकार को पढ़ने की आदत अवश्य होनी चाहिए। छोटे बड़े हर कहानीकार को पढ़ें। कुछ न कुछ नया आपको अवश्य मिलेगा।

कोई 3 किताबें जो हर किसी को पढ़नी चाहिए और क्यों पढ़नी चाहिए?

गोदान, रश्मिरथी और माई एक्सपेरिमेंट्स विथ ट्रुथ।

आपने अपने जीवन में सबसे बड़ा बदलाव क्या देखा है?

मेरे जीवन में सबसे बड़ा बदलाव लोगों से कनैक्ट होना, उनसे बातें करना और उनके सुख दुख में शामिल होने का आया है। पहले में लोगों से कम ही बोलता था। मेरे जवाब हां या न में अधिक हुआ करते थे। अपने आप से बोलने की पहल करने में बड़ा संकोच होता था। तन्हाई शामिल है अपनी आदत में, महफिल में थोड़ी दुश्वारी होती है। ये पंक्तियां मेरी उसी सोच को दर्शाती हैं।लेकिन जैसे जैसे कविताओं और कहानियों के माध्यम से लोग मुझे जानने लगे मैं भी उनसे खुलकर बातचीत करने लगा।

आपकी कविताओं को पढ़कर लोगों को क्या बदलाव आता है?

देखिए बदलाव हालांकि कम ही लोगों में आता है लेकिन अगर कोई एक भी आपके पास आकर बोलता है कि मैंने आपकी ये कहानी पढ़ी या ये रचना सुनी और लाइफ़ को देखने का मेरा नजरिया ही बदल गया तो सच मानिए जो आत्मिक संतुष्टि मिलती है वो आपको किसी पुरस्कार से नहीं मिल सकती।

आपका भविष्य में क्या लक्ष्य है और कैसे पूरा करेंगे ?

भविष्य में अधिक से अधिक लोगों की सोच को अपनी कविताओं और कहानियों के माध्यम से बदलना उन्हें प्रेम और शांति के रास्ते पर लाना ही मेरा लक्ष्य रहेगा।

 

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BRIJESH SINGH
the authorBRIJESH SINGH