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अच्छी कहानी ही असली स्टार है” – निर्देशक राहुल हरित से अंकित गोयल की खास बातचीत

न्यूज़ जर्नलिस्ट अंकित कुमार गोयल

नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ दर्शकों की पसंद तेजी से बदल रही है। एक समय था जब फिल्मों की सफलता बड़े सितारों के नाम पर तय होती थी, लेकिन अब कहानी, अभिनय और कंटेंट सबसे बड़ी ताकत बन चुके हैं। OTT प्लेटफॉर्म ने दर्शकों को नई सोच दी है और फिल्मकारों के सामने नई चुनौतियाँ भी खड़ी की हैं।

इसी बदलते दौर में फिल्म “तू कौन मैं खामखा” के निर्माता-निर्देशक राहुल हरित पारिवारिक मनोरंजन को फिर से सिनेमा के केंद्र में लाने का प्रयास कर रहे हैं। लगभग 28 वर्षों के थिएटर, टेलीविजन और फिल्म निर्माण के अनुभव रखने वाले राहुल हरित मानते हैं कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने का माध्यम भी है। News Journalist अंकित कुमार गोयल ने राहुल हरित से उनके संघर्ष, थिएटर, निर्देशन, OTT, पारिवारिक फिल्मों और फिल्म “तू कौन मैं खामखा” को लेकर विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस एक्सक्लूसिव इंटरव्यू के प्रमुख अंश।

आपने थिएटर से लेकर OTT तक लगभग 28 वर्षों का सफर तय किया है। ऐसे समय में, जब OTT पर एक्शन और क्राइम आधारित कंटेंट का दबदबा है, आपने पारिवारिक कॉमेडी फिल्म “तू कौन मैं खामखा” बनाने का फैसला क्यों किया?

देखिए, आज की जिंदगी बहुत तेज़ हो गई है। हर व्यक्ति किसी न किसी तनाव में जी रहा है। परिवार के साथ समय बिताने का अवसर कम होता जा रहा है। चारों ओर अपराध, दुर्घटनाएँ और नकारात्मक खबरें दिखाई देती हैं। ऐसे माहौल में मुझे लगा कि दर्शकों को ऐसी फिल्म मिलनी चाहिए जिसे पूरा परिवार साथ बैठकर देख सके, मुस्कुरा सके और कुछ समय के लिए अपनी परेशानियाँ भूल जाए। मेरी कोशिश यही रही कि दर्शकों को हल्का-फुल्का, स्वस्थ और पारिवारिक मनोरंजन मिले।

आपकी अभिनय यात्रा की शुरुआत थिएटर से हुई। दिल्ली आर्ट थिएटर के दिनों की कौन-सी सीख आज भी आपके साथ है?

दिल्ली आर्ट थिएटर में मेरी गुरु स्वर्गीय शीला भाटिया जी थीं। उन्होंने हमें सबसे पहले आवाज़ और भाषा का महत्व समझाया। उनका कहना था कि यदि किसी कलाकार की भाषा स्पष्ट है और उसकी आवाज़ प्रभावशाली है, तो वह अपने अभिनय से दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ सकता है। आज भी मैं मानता हूँ कि अभिनय की सबसे मजबूत नींव संवाद अदायगी और भाषा पर पकड़ होती है।

आज के युवाओं और नए कलाकारों के लिए आवाज़ और संवाद अदायगी को लेकर आप क्या सलाह देना चाहेंगे?

सबसे पहले अपनी प्राकृतिक आवाज़ को पहचानिए। ऊँची आवाज़ में बोलना प्रभावशाली अभिनय नहीं होता। थिएटर के बड़े कलाकारों की पहचान उनकी आवाज़ होती है। जब आपकी आवाज़ संतुलित, स्पष्ट और प्रभावशाली होगी, तभी लोग आपकी बात ध्यान से सुनेंगे। अभिनय में आवाज़ सबसे बड़ा हथियार है।

हर सफल व्यक्ति के पीछे संघर्ष की एक कहानी होती है। आपके शुरुआती दिनों का संघर्ष कैसा रहा?

मैं उसे संघर्ष नहीं, बल्कि सीख का दौर कहूँगा। कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ मैं नियमित रूप से थिएटर करता था। दिन का एक बड़ा हिस्सा अभ्यास, रिहर्सल और अभिनय सीखने में बीतता था। लगातार कई वर्षों तक थिएटर करने से अनुशासन, धैर्य और टीमवर्क की समझ विकसित हुई। वही अनुभव आगे चलकर निर्देशन में सबसे अधिक काम आया।

आपके अनुसार एक अच्छा निर्देशक बनने के लिए सबसे महत्वपूर्ण गुण क्या है?

सबसे पहले निर्देशक को अभिनय समझना चाहिए और उसके बाद दर्शकों की मानसिकता। मेरे अनुसार निर्देशक अभिनेता और दर्शक के बीच एक पुल होता है। वह अभिनेता से वही भाव निकलवाता है, जो दर्शकों तक सही रूप में पहुँचे। जब निर्देशक अभिनेता को किरदार की दुनिया समझा देता है, तभी पर्दे पर सच्चा अभिनय दिखाई देता है। यही निर्देशन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

आपका सफर DD Metro से फिल्मों तक रहा है। उस दौर का कोई ऐसा अनुभव जो आज भी याद हो?

DD Metro के दिनों में काम करने का अनुभव बेहद चुनौतीपूर्ण था। उस समय 13 एपिसोड का एक प्रोजेक्ट मिला था, जिसमें हर सप्ताह शूटिंग, एडिटिंग और प्रसारण का पूरा काम तय समय के भीतर करना होता था। कई बार ऐसा हुआ कि टीम के कुछ सदस्य उपलब्ध नहीं रहे। तब मुझे खुद कैमरा संभालना पड़ा, खुद एडिटिंग करनी पड़ी और समय पर एपिसोड प्रसारण के लिए तैयार करना पड़ा। कई रातें स्टूडियो में ही गुज़रीं। वही समय था जिसने मुझे सिखाया कि एक फिल्मकार को हर परिस्थिति में काम करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

आपने निर्देशन, संपादन और अन्य तकनीकी क्षेत्रों में भी काम किया है। इन अनुभवों ने आपको क्या सिखाया?

फिल्म निर्माण केवल कैमरा चलाने या कलाकारों को निर्देश देने का नाम नहीं है। हर विभाग की अपनी जिम्मेदारी होती है। लोग अक्सर सोचते हैं कि एडिटिंग का मतलब केवल दृश्य काटना है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं आगे है। एडिटिंग कहानी की गति, भावनाओं और निर्देशक की सोच को सही रूप देने की प्रक्रिया है। जब निर्देशक और एडिटर एक-दूसरे की समझ के साथ काम करते हैं, तभी फिल्म प्रभावशाली बनती है।

आपकी आने वाली फिल्म “तू कौन मैं खामखा” की कहानी कैसे जन्मी?

इस फिल्म की शुरुआत एक वास्तविक पारिवारिक घटना से हुई। मेरे परिवार में जुड़वाँ सदस्य हैं और कई बार उन्हें पहचानने में मज़ेदार भ्रम की स्थिति बन जाती थी। वहीं से मेरे मन में विचार आया कि अगर एक जैसी पहचान वाले कई पात्र हों तो कितनी हास्यपूर्ण परिस्थितियाँ पैदा हो सकती हैं। बाद में इस विचार को कहानी का रूप दिया गया। यह फिल्म भ्रम, हास्य और पारिवारिक मनोरंजन का एक अनोखा मिश्रण है।

 

आप अपनी फिल्मों में नए कलाकारों को लगातार अवसर देते हैं। इसके पीछे क्या सोच रहती है?

मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण कलाकार का प्रदर्शन है। यदि किसी कलाकार में सीखने की इच्छा है, मेहनत करने का जज़्बा है और वह समय दे सकता है, तो वह निश्चित रूप से अच्छा काम करेगा। बड़े कलाकारों की अपनी व्यस्तताएँ होती हैं, जिससे कई बार प्रोजेक्ट प्रभावित होते हैं। नए कलाकार पूरी लगन के साथ काम करते हैं और दर्शकों के सामने खुद को साबित करने की कोशिश करते हैं। आज का दर्शक भी केवल स्टार नहीं, बल्कि अच्छा अभिनय और मजबूत कहानी देखना चाहता है।

क्या OTT प्लेटफॉर्म आने के बाद स्वतंत्र फिल्मकारों के लिए नए अवसर बढ़े हैं?

बिलकुल। OTT ने दर्शकों की सोच को बदल दिया है। पहले लोग फिल्मों में केवल बड़े सितारों को देखने जाते थे, लेकिन अब कंटेंट सबसे बड़ा आकर्षण बन गया है। अगर कहानी अच्छी है और प्रस्तुति प्रभावशाली है तो नए कलाकार भी दर्शकों का दिल जीत सकते हैं। यही कारण है कि आज कई छोटे बजट की फिल्में और वेब सीरीज़ भी बड़ी सफलता हासिल कर रही हैं।

भारतीय सिनेमा के भविष्य को आप किस नजरिए से देखते हैं?

भारतीय सिनेमा का भविष्य मजबूत कहानियों में है। दक्षिण भारतीय फिल्मों ने यह साबित किया है कि यदि कहानी दमदार हो तो कलाकार स्वयं बड़े सितारे बन जाते हैं। दर्शक अब नए विषयों, नए कलाकारों और नए प्रयोगों को स्वीकार कर रहे हैं। यही बदलाव भारतीय सिनेमा को और समृद्ध बनाएगा।

 

अंत में हमारे पाठकों और दर्शकों के लिए आपका क्या संदेश रहेगा?

यदि आप चाहते हैं कि परिवार के साथ बैठकर देखने योग्य अच्छी फिल्में बनें, तो ऐसे सिनेमा को प्रोत्साहित कीजिए। आज समाज में तनाव बढ़ रहा है और स्वस्थ मनोरंजन की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। पारिवारिक कॉमेडी केवल हँसाती ही नहीं, बल्कि लोगों को जोड़ने का काम भी करती है। दर्शक यदि ऐसे कंटेंट को समर्थन देंगे, तो निश्चित रूप से भविष्य में और अधिक गुणवत्तापूर्ण पारिवारिक फिल्में बनेंगी।

 

BRIJESH SINGH
the authorBRIJESH SINGH