
न्यूज़ जर्नलिस्ट अंकित कुमार गोयल
न्यूज जर्नलिस्ट अंकित कुमार गोयल द्वारा आज की खबर के लिए की गई इस विशेष बातचीत में IIT दिल्ली से PhD की उपाधि प्राप्त डॉ. दिनेश कुमार भारती ने अपनी शिक्षा, पेशेवर जीवन, कॉर्पोरेट क्षेत्र, उद्यमिता, मीडिया अनुभव और शोध यात्रा के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से बातचीत की। डॉ. भारती का शोध विषय “Value Chain Management of Panchgavya Products” है। उनके शोध का प्रमुख उद्देश्य पंचगव्य उत्पादों को आधुनिक Value Chain Management, Value Addition और Scientific Validation की अवधारणाओं से जोड़कर उनकी उपयोगिता और आर्थिक संभावनाओं को समझना है।

इस विशेष बातचीत में उन्होंने बचपन से गाय के प्रति अपने लगाव, दिल्ली में गायों की स्थिति देखकर पैदा हुए सवाल, IIT दिल्ली में PhD करने के निर्णय, गोपालक की भूमिका, पंचगव्य उत्पादों की Value Chain, Scientific Validation, शोध को जमीन पर उतारने की योजना, परिवार और शोध-गाइड के योगदान तथा युवाओं के लिए अपने संदेश पर खुलकर विचार साझा किए।
डॉ. भारती जी, सबसे पहले आज की खबर में आपका बहुत-बहुत स्वागत है। आपने किस विषय में PhD की है और अपने शोध को आम भाषा में कैसे समझाएंगे?
बहुत-बहुत धन्यवाद अंकित जी और आज की खबर का भी आभार कि आपने इस विषय पर चर्चा के लिए मुझे आमंत्रित किया। मेरी PhD का विषय “Value Chain Management of Panchgavya Products” है। पंचगव्य को हम गाय से जोड़कर देखते हैं। इसमें दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र शामिल हैं। हमारी परंपरा और संस्कृति में इनका विशेष महत्व रहा है।

पहले गांव की पहचान ही गाय और किसान से होती थी। कहा जाता था कि जिस गांव में गाय और किसान दोनों हैं, वही वास्तविक अर्थ में गांव है। आज गांव तो हैं, लेकिन कई जगह गायों की संख्या कम होती चली गई है। मेरा शोध इस बात पर केंद्रित रहा कि गाय और गाय से प्राप्त उत्पादों को केवल दूध तक सीमित करके न देखा जाए, बल्कि उनके व्यापक उपयोग और आर्थिक मूल्य को समझा जाए तथा आधुनिक प्रबंधन और वैज्ञानिक वैलिडेशन के माध्यम से एक व्यवस्थित Value Chain तैयार की जाए।
इस शोध को चुनने के पीछे आपकी व्यक्तिगत प्रेरणा क्या थी?
मेरे मन में यह विचार नहीं था कि मुझे IIT जाकर PhD करनी है या नाम के आगे डॉक्टर लगाना है। गाय के प्रति मेरा लगाव बचपन से था। हमारे घर में गाय थी और स्कूल जाते समय भी मैं गायों को देखा करता था। मुझे कक्षा तीन की एक घटना आज भी याद है। एक दिन सुबह बाकी गायें चली गई थीं, लेकिन एक गाय ठंड के कारण वहीं लेटी हुई थी। लोग उसे देखकर निकल रहे थे। मुझे लगा कि जैसे इंसान को ठंड लगती है, वैसे ही इसे भी ठंड लग रही होगी। मैंने स्कूल जाते समय अपना छोटा-सा कोट उस गाय पर डाल दिया। जब मैं वापस आया तो मां ने पूछा कि मेरा कोट कहां है। तब मुझे याद आया कि मैंने वह गाय पर डाल दिया था। मैं वापस गया तो कोट वहीं था, लेकिन गाय जा चुकी थी।उस घटना ने मेरे मन में गाय के प्रति एक अलग अपनापन पैदा किया। बाद में गोबर उठाना, उससे छोटी-छोटी चीजें और खिलौने बनाना तथा गाय के पास जाकर उसे सहलाना भी मेरे लिए सहज और आनंद देने वाला काम था।
दिल्ली आने के बाद गायों की स्थिति देखकर आपके मन में क्या बदलाव आया?
जब मैं दिल्ली आया तो यहां की परिस्थितियां अलग थीं। दिल्ली जैसे शहर में गाय रखना आसान नहीं था। कुछ स्थानों पर मैंने देखा कि गायों की स्थिति अच्छी नहीं थी। कुछ लोग दूध निकालने के बाद गाय को छोड़ देते थे और जब वह दूध देना बंद कर देती थी तो उसे अनुपयोगी समझ लिया जाता था।

तब मेरे मन में सवाल आया कि इसके लिए क्या किया जाए?
भारत सरकार के मंत्रालय में लोगों से मिलने का अवसर मिला। वहां से मुझे कई बातें समझने को मिलीं। मुझे लगा कि गाय से जुड़े विषय पर बहुत कुछ किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए Scientific Validation की आवश्यकता है। यहीं से मेरे मन में इस विषय को शोध के माध्यम से आगे बढ़ाने का विचार मजबूत हुआ।
आपने IIT दिल्ली में PhD करने का निर्णय कैसे लिया?
मैंने इसके लिए परीक्षा की तैयारी की, परीक्षा दी, इंटरव्यू हुआ और उसके बाद मुझे Concept Paper देना पड़ा। मेरे सामने विकल्प था कि किसी भी विषय पर PhD की जा सकती है, लेकिन मैंने वही विषय चुना जिसमें मुझे लगता था कि वैज्ञानिक वैलिडेशन की आवश्यकता है। IIT दिल्ली के Department of Management Studies के माध्यम से मैंने Management की Value Chain तकनीक को इस विषय से जोड़ने का प्रयास किया। Value Chain की तकनीक का उपयोग आमतौर पर कई बड़े उद्योगों, विशेष रूप से ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में देखा जाता है। मेरा प्रयास था कि इसी प्रकार की व्यवस्थित सोच को पंचगव्य उत्पादों के क्षेत्र में लागू किया जाए।
पंचगव्य उत्पादों के क्षेत्र में Value Chain का क्या महत्व है?
Value Chain का अर्थ है कि किसी उत्पाद के निर्माण से लेकर उसके अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया को व्यवस्थित तरीके से समझा जाए। इसमें उत्पाद का संग्रह, गुणवत्ता, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, वितरण और बाजार तक पहुंच जैसे कई पहलू शामिल हो सकते हैं। यदि गोपालक के पास संसाधन हैं, लेकिन उसे बाजार, पैकेजिंग या ब्रांडिंग की जानकारी नहीं है तो उसके उत्पाद को उचित मूल्य नहीं मिल पाएगा। इसलिए मेरा प्रयास है कि इस पूरी प्रक्रिया को व्यवस्थित तरीके से समझा जाए और गोपालक तथा उपभोक्ता के बीच ऐसी व्यवस्था विकसित हो जिसमें दोनों को लाभ मिले।
गोपालक की भूमिका को आप इस पूरी व्यवस्था में किस तरह देखते हैं?
गोपालक इस पूरी Value Chain का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि गोपालक को केवल कच्चा माल उपलब्ध कराने वाले व्यक्ति के रूप में देखा जाएगा तो उसे मिलने वाला आर्थिक लाभ सीमित रह सकता है। लेकिन यदि उसे Value Addition, Processing, Packaging, Branding और Market Linkage से जोड़ा जाए तो उसके आर्थिक अवसर बढ़ सकते हैं। इसके लिए प्रशिक्षण, तकनीकी जानकारी और सही बाजार व्यवस्था की आवश्यकता है।
गोबर से बनने वाले आधुनिक उत्पादों की संभावनाओं को आप किस तरह देखते हैं?
आज गोबर का उपयोग केवल घर के लेपन तक सीमित नहीं रह गया है। गोबर से अलग-अलग प्रकार की सजावटी और उपयोगी वस्तुएं बनाई जा रही हैं। घर में रखने वाली वस्तुएं, छोटी-छोटी सजावटी चीजें और पर्यावरण के अनुकूल उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। गोबर से बने Eco-Friendly Products का उपयोग बढ़ सकता है और इससे गोपालक को भी आर्थिक अवसर मिल सकते हैं। रहन-सहन बदला है तो गोबर के उपयोग का स्वरूप भी बदलना चाहिए—यही Value Addition की दिशा है।
गोमूत्र और उसके उपयोग को लेकर भी कई सवाल होते हैं। आपका शोध इसे किस संदर्भ में देखता है?
गोमूत्र को केवल सामान्य रूप में देखने के बजाय उसके विभिन्न उपयोगों और प्रक्रियाओं को समझना आवश्यक है। गोमूत्र और उसके अर्क में अंतर होता है। विभिन्न पारंपरिक और आयुर्वेदिक संदर्भों में अर्क के रूप में उपयोग की बात आती है। मेरे शोध का उद्देश्य इन उत्पादों की उपयोगिता को वैज्ञानिक और व्यवस्थित दृष्टिकोण से समझना है, ताकि शुद्धता, गुणवत्ता और सही उपयोग पर ध्यान दिया जा सके।
आप बार-बार Scientific Validation की बात कर रहे हैं। आम पाठक इसे सरल भाषा में कैसे समझे?
Scientific Validation का सरल अर्थ है कि हमारी परंपरा से जुड़ी किसी चीज की आधुनिक समय में उपयोगिता को वैज्ञानिक तरीके से समझा और जांचा जाए। उदाहरण के तौर पर गोबर से दीपक बनाया जाता है। यदि वह दीपक जलकर पूरी तरह राख हो जाए और उसके कारण मंदिर या आसपास आग लगने का खतरा हो तो समस्या पैदा हो सकती है।
वैज्ञानिक वैलिडेशन के माध्यम से यह देखा जा सकता है कि गोबर से बने दीपक में ऐसा क्या संयोजन हो जिससे वह ठीक से जले, लेकिन आसपास नुकसान न हो। इसी तरह दूध में भी केवल दूध बेचने के बजाय उसमें Value Addition किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर गाय के दूध से खोया या मावा तैयार किया जाए और उसकी उपयोगिता तथा बाजार मूल्य को समझा जाए। यानी किसी उत्पाद की गुणवत्ता, उपयोगिता और मूल्य को वैज्ञानिक तरीके से बेहतर समझना और बढ़ाना Scientific Validation तथा Value Addition की दिशा में महत्वपूर्ण है।
आपके शोध के परिणाम आम लोगों और समाज की जिंदगी को कैसे बेहतर बना सकते हैं?
आज देश में हम अक्सर यह सवाल करते हैं कि हमारे घर में उपलब्ध कोई चीज शुद्ध है या नहीं। पैसा होने पर हम कोई भी चीज खरीद सकते हैं, लेकिन सवाल यह है कि जो हमने खरीदा है, उसकी वास्तविक Value हमें मिली या नहीं। यहीं Value for Money की बात आती है। एक तरफ गोपालक है और दूसरी तरफ आम उपभोक्ता। हर व्यक्ति गाय नहीं रख सकता, लेकिन उसे दूध, घी, दही और दूसरे उत्पादों की आवश्यकता होती है। गोबर का भी केवल पारंपरिक लेपन तक सीमित उपयोग नहीं है। आज इसके अलग-अलग रूपों में उत्पाद बनाए जा सकते हैं। इस तरह गोपालक को आर्थिक लाभ मिल सकता है और उपभोक्ता को उपयोगी तथा Value देने वाला उत्पाद मिल सकता है। मेरे शोध का उद्देश्य इन सभी चीजों को एक व्यवस्थित Value Chain में जोड़ना है।
IIT दिल्ली में PhD अवॉर्ड के समय प्रधानमंत्री की मौजूदगी आपके लिए कितनी यादगार रही?
हमारे देश के प्रधानमंत्री का Chief Guest के रूप में आना हमारे लिए बहुत सौभाग्य का क्षण था। इस उपलब्धि के पीछे कई वर्षों की मेहनत के साथ परिवार, शिक्षक, सहकर्मी और शुभचिंतकों का सहयोग रहा। हमें लगभग तीन दिन पहले पता चला था कि प्रधानमंत्री जी Chief Guest के रूप में आने वाले हैं। सबसे अच्छी बात यह रही कि उन्होंने वहां केवल औपचारिक बात नहीं की, बल्कि विद्यार्थियों और शोधार्थियों से जीवन के संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण बात कही।
उन्होंने समझाया कि संस्थान में पढ़ाई के दौरान प्रश्न पहले से तय होते हैं और हम उनके उत्तर की तैयारी कर सकते हैं, लेकिन जीवन से जुड़े बहुत से प्रश्न पहले से तय नहीं होते और उनके उत्तर हमारे पास तैयार नहीं होते। इसलिए संस्थान से निकलने के बाद जीवन के उन प्रश्नों के लिए तैयार रहना चाहिए। मेरे लिए यह बात बहुत प्रेरणादायक रही। मुझे लगा कि PhD पूरी होना जीवन की यात्रा का अंत नहीं, बल्कि दूसरी यात्रा की शुरुआत है।
शोध को Lab से निकालकर समाज तक ले जाने की बात होती है। आप अपने शोध को जमीन पर कैसे उतारेंगे?
जब मैंने यह विषय लिया तो मेरा उद्देश्य केवल शोध करना नहीं था। भारत सरकार में काम करने के दौरान मुझे लगा कि सरकार नीतियां बहुत अच्छी सोच के साथ बनाती है, लेकिन कई बार वे योजनाएं और नीतियां नीचे अंतिम व्यक्ति तक पूरी तरह नहीं पहुंच पातीं।
Ground Level पर शोध के दौरान मैंने देखा कि कई लोगों को पता ही नहीं होता कि भारत सरकार या राज्य सरकार उनके लिए कौन-सी योजनाएं चला रही हैं। आम गोपालक, किसान और उद्यमी को यह जानकारी होनी चाहिए कि उनके लिए कौन-सी सुविधाएं उपलब्ध हैं और उनका लाभ कैसे लिया जा सकता है।
कई बार उनके पास Presentation, Documentation, Branding, Packaging या Value Chain की व्यवस्था नहीं होती। यदि इन चीजों को व्यवस्थित किया जाए तो वे सरकारी सुविधाओं और योजनाओं का बेहतर लाभ उठा सकते हैं।
आपकी पूरी यात्रा में परिवार और आपके शोध-गाइड का कितना योगदान रहा?
हम जीवन में जो कुछ भी हैं, उसमें माता-पिता, गुरु और शिक्षक का बहुत बड़ा योगदान होता है। यदि उनका आशीर्वाद, साथ, सहयोग और उत्साह न मिले तो हम बहुत कुछ नहीं कर सकते। मेरे माता-पिता ने हमेशा मेरा उत्साह बढ़ाया और कहा कि जिस क्षेत्र में काम कर रहे हो, उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास करो।
Research के दौरान Guide की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण रही। शोध में कई बार बहुत सारी चीजें सामने आती हैं और शोधार्थी अलग-अलग दिशाओं में जाने लगता है। ऐसे समय Guide शोधार्थी को मुख्य दिशा में बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मुझे अपने Guide से लगातार मार्गदर्शन और सहयोग मिला और उन्होंने मुझे शोध के दौरान भटकने से बचाया।
मेरे दो गाइड रहे—डॉ. काव्या दसोरा जी, Centre for Rural Development and Technology (CRDT), IIT दिल्ली, और डॉ. प्रोफेसर सूर्य प्रताप सिंह जी, Department of Management Studies, IIT दिल्ली। दोनों ने मेरी शोध यात्रा में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दिया। एक ओर मुझे वैज्ञानिक एवं तकनीकी दृष्टिकोण को समझने का अवसर मिला, तो दूसरी ओर मैनेजमेंट की वैज्ञानिक तकनीकों और प्रबंधन-प्रथाओं (Management Practices) को समझने तथा उन्हें समस्या-समाधान की दिशा में लागू करने का अवसर मिला। इस तरह तकनीक और प्रबंधन के समन्वय ने मेरे शोध को एक व्यावहारिक और समाधान-केंद्रित दृष्टिकोण प्रदान किया।
आज आज की खबर के उन विद्यार्थियों और युवाओं के लिए आपका क्या संदेश है जो Research के क्षेत्र में आना चाहते हैं?
मैं उन सभी विद्यार्थियों और युवाओं का आह्वान करता हूं जो Research करना चाहते हैं कि वे आगे आएं। लेकिन केवल इसलिए नहीं कि उन्हें PhD करनी है या नाम के आगे डॉक्टर लगाना है। Research का उद्देश्य यह होना चाहिए कि हमारे माध्यम से समाज में कोई समाधान पहुंचे। ऐसा शोध होना चाहिए जिससे किसी व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान आए और हमारे जाने के बाद भी उस शोध का उपयोग समाज में होता रहे। यदि हम इस भावना के साथ शोध करते हैं तो समाज की समस्याओं के समाधान की दिशा में हमारा पहला कदम होगा। परिवार, समाज और राष्ट्र के हित को ध्यान में रखकर काम करना चाहिए। समाज में बहुत समस्याएं हैं। कुछ लोग पूरी जिंदगी केवल समस्याएं गिनाने में लगा देते हैं, लेकिन समाज उन लोगों को याद रखता है जिन्होंने समाधान दिया। इसलिए सकारात्मक सोच के साथ Research के क्षेत्र में आइए। जो व्यक्ति वास्तव में किसी समस्या का समाधान खोजना चाहता है, वही Research के क्षेत्र में आए।








