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‘धमाका’ करने में नाकाम रही कार्तिक आर्यन की फिल्म, कहानी और निर्देशन ने भी किया निराश

लखनऊः कार्तिक आर्यन हिंदी सिनेमा का अनोखा करिश्मा हैं। किसी फिल्मी परिवार से नहीं हैं। करण जौहर और शाहरुख खान जैसे बड़े निर्माताओं की फिल्मों से निकाले जा चुके हैं। कुल 10 साल का करियर है। 11 फिल्में कर चुके हैं। तीन फिल्में सौ करोड़ रुपये से ऊपर का कारोबार कर चुकी हैं। कामयाबी का औसत 50 फीसदी से ज्यादा है। बस उनके आसपास कोई ईमानदार सलाहकार नहीं है। जो भी करीब है, वह बस फायदे की तलाश में है। नतीजा खुद कहानियां तलाशनी पड़ रही हैं। खुद अच्छे निर्देशकों को आवाज देनी पड़ रही है। रोज कुछ न कुछ लोचा निजी जिंदगी में उनकी चलता ही रहता है। फिर भी हिम्मत बाकी है कि प्रयोगधर्मी सिनेमा बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। कोरियाई फिल्म ‘द टेरर लाइव’ को हिंदी में बनाने का आइडिया खुद कार्तिक का है। फिल्म के निर्देशक राम माधवानी को ये बताने में हिचक भी नहीं है कि इस फिल्म की स्क्रिप्ट लेकर खुद कार्तिक उनके पास आए थे।

इस लिहाज से देखें तो फिल्म ‘धमाका’ कार्तिक आर्यन की फिल्म है। राम माधवानी को एक कहानी को एक नए परिवेश में ढालने का मौका दिया गया था लेकिन वह उस पर सौ फीसदी खरे नहीं उतर सके। राम माधवानी की शख्सीयत का अक्स फिल्म ‘धमाका’ में दिखता है। फिल्म सीरियस होने का ढोंग तो खूब करती है लेकिन उसकी फितरत सीरियस रहने की है नहीं। समाचार चैनलों पर ये टिप्पणी करने की कोशिश भी करती है लेकिन समाचार चैनलों का असली तत्व फिल्म परदे पर ला नहीं पाती है। मुंबई की बहुमंजिला इमारत में चलने वाला न्यूज चैनल कितना भी गिरा पड़ा क्यों न हो, उसके संपादक की रीढ़ की हड्डी इतनी लिजलिजी भी नही होगी कि वह अपने पीसीआर में एटीएस के किसी बंदे को प्रोड्यूसर बनकर बैठ जाने दे।

जिन्होंने न्यूज चैनलों में काम किया है, वे जानते हैं कि ऐसे मौकों पर काम कैसे गोली की रफ्तार से होता है। पीसीआर तब वॉर रूम होता है। प्रोड्यूसर का बीपी 150 के ऊपर होना वहां आमबात है और एंकर अगर अर्जुन पाठक जैसा शार्प होता है तो आधे से ज्यादा फैसले खुद लेता है। और, ब्रेकिंग न्यूज। ब्रेकिंग न्यूज अब भी, इतना सब कुछ होने के बाद भी किसी भी न्यूज चैनल का ईमान होता है। गिरा से गिरा एंकर भी उसे रोककर अपनी प्राइमटाइम की एंकरिंग की सौदबाजी नहीं करेगा। राम माधवानी का भी दावा यही है कि ये फिल्म न्यूज चैनलों के बारे में नहीं है। ये एक इंसान का व्यकिगत संघर्ष है जिसमें न्यूज चैनल एक पृष्ठभूमि भर है। अर्जुन के अपनी पत्नी से तलाक के जिक्र से शुरू हुई फिल्म ‘धमाका’ के आखिर में जाकर पता चलता है कि यहां निजी और व्यावसायिक रिश्तों की असल उलझन क्या है।

फिल्म ‘धमाका’ कार्तिक आर्यन के करियर की बेहतरीन फिल्म हो सकती थी। उन्होंने मेहनत भी काफी की है। लेकिन, उन्हें इस रोल की तैयारी के लिए उन लोगों से मिलना चाहिए था जिन्होंने किसी न्यूज चैनल के पीसीआर में पूरा पूरा दिन बिना ब्रेक लिए ब्रेकिंग न्यूज के लिए गुजारे हैं। फिल्म की कहानी तो खैर उधार की ही है और पटकथा भी इसकी काफी कमजोर है। फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी है इसका निर्देशन। पूरी फिल्म देखकर कहीं से भी लगता नहीं है कि कार्तिक आर्यन को किसी तरह का दिशा निर्देशन किसी सीन के लिए यहां दिया जा रहा है और कार्तिक ने भी अपने किरदार के लिए खास रिसर्य की हो, फिल्म देखकर समझ नहीं आता। मृणाल ठाकुर फिल्म में फिलर की तौर पर इस्तेमाल हो गई हैं। अमृता सुभाष ने अतीत में इससे कहीं उम्दा काम किया है।

कथा, पटकथा, निर्देशन, सिनेमैटोग्राफी, संपादन और अभिनय हर विभाग में फिल्म ‘धमाका’ एक कमजोर फिल्म साबित होती है। ये फिल्म बस एक फिल्म बनाने भर के लिए बना दी गई लगती है। फिल्म में कार्तिक को अब तक की सबसे मोटी फीस और फिल्म के सबसे कम समय में शूट हो जाने की चर्चाएं खूब होती रही हैं। लेकिन, फिल्म बनी कैसी है, इसकी चर्चाओं के आगे अब वे सब धूमिल हो जाएंगी। फिल्म का असली सच भी यही होता है। बनने के बाद परदे पर ये सिर्फ सच दिखाती है और वहां किसी तरह का कोई तिकड़मबाजी काम नहीं आती है। कार्तिक को जरूरत है कुछ अच्छी कहानियों की और एक ऐसे मेंटॉर की जो उन्हें सही फिल्में चुनने में मदद कर सके। उनके करियर का अगला ‘धमाका’ भी शायद तभी हो सकेगा।

 

 

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